हर बात को दिल से लगाना जरूरी नहीं…

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उसने ऐसे कैसे कह दिया? पूरी रात मुझे नींद नहीं आई। मैंने इतना सब कुछ किया फिर भी सब मेरा ही दिल दुखाते हैं…। यह बातें अक्सर हमारे दिमाग में तब आती हैं जब कोई हमारे लिए ऐसा कुछ कह देता है, जो हम सुनना नहीं चाहते। दरअसल दिल तब दुखता है जब हम सामने वाले की बात को दिल से लगा लेते हैं। दिल से लगाना मतलब उस बात को अपने ज़ेहन में बसा लेना। फिर यही सोचना कि ऐसा क्यों कहा गया, मुझमें क्या कमी है, मेरे बारे में ऐसा क्यों सोचा और ना जाने क्या क्या…।

समस्या यह नहीं है कि फलां व्यक्ति ने हमारे लिए क्या कहा, समस्या यह है कि हमने उसकी बात को कितनी तवज्जो दी। हमारे आस पास दो तरह के लोग होते हैं, कुछ ऐसे लोग होते हैं, जिनकी बातें हमारे लिए मायने रखती हैं। यह लोग हमारा हमेशा अच्छा चाहते हैं और हमारे भले के लिए ही सलाह देते हैं। दूसरे वे लोग होते हैं जिन्हें हम सिर्फ जानते हैं। इन लोगों का हमारी निजी जिंदगी पर ज्यादा अधिकार नहीं होता।

जब पहले वाली श्रेणी के लोग हमें कुछ कहते हैं तो निश्चित तौर पर वे हमारा भला चाहते हैं। लेकिन दूसरी श्रेणी के लोग जब हमें कुछ कहते हैं तो वे कुछ भी कहने से पहले यह विश्लेषण नहीं करते कि फलां बात से आपका दिल दुखेगा या नहीं। वे सिर्फ अपनी बात कह देते हैं। ऐसे में अब यह आपके ऊपर निर्भर करता है कि आप उन बातों को कितना दिल से लगाते हैं। सामने वाले ने जो भी बात कही वह अपने विश्लेषण के आधार पर कही लेकिन जरूरी नहीं कि वह आपको सही लगे। ऐसे में बेहतर यही है कि उन बातों पर ज्यादा गौर ना किया जाए। ऐसी बातों को जितनी जल्दी भूला दिया जाए उतना अच्छा होता है। जब आप इन बातों को लेकर बैठ जाते हैं तो ​निश्चित तौर पर यह आपको परेशान करेगा। यह ऐसा तनाव है जो आपने खुद जबरदस्ती ले रखा है इसलिए अगली बार कोई भी बात दिल से लगाने से पहले यह सोच लें कि वह बात किसने कही है और वह आपकी जिंदगी में कितनी अहमियत रखता है।

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