विशेष: रॉकेट का प्रयोग करने वाले दुनिया के पहले शासक थे टीपू सुल्तान

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Tipu-Sultan-Biography

मैसूर साम्राज्य के शासक और अंतिम क्षणों तक अंग्रेजों से लोहा लेने वाले टीपू सुल्तान की 20 नवंबर को 260वीं जयंती हैं। उन्हें ‘मैसूर का टाइगर’ के नाम से भी जाना जाता है। उनके समय में मैसूर के तोपखाने में आधुनिक हथियार रॉकेट मौजूद थे। उन्होंने अपने शासन काल में कई प्रशासनिक नवाचारों की शुरुआत की, जिसमें नई सिक्का प्रणाली, कैलेंडर और नई भू-राजस्व प्रणाली शामिल थी। उसके समय में मैसूर में रेशम उद्योग की शुरुआत हुई। भारत के पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइल मैन डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने भी माना था कि विश्व में सबसे पहले रॉकेट अविष्कारक टीपू सुल्तान ही थे।

टीपू सुल्तान का जीवन परिचय

मैसूर के सुल्तान टीपू सुल्तान का जन्म 20 नवंबर, 1750 को वर्तमान कर्नाटक के कोलार जिले के देवनहल्ली में हुआ था। उनका पूरा नाम फतेह अली टीपू था। वह साहसी, विद्वान, संगीत और स्थापत्य कला प्रेमी था। उसके पिता हैदर अली थे, जो एक सैनिक से उठकर मैसूर साम्राज्य के शासक बने। उन्होंने दक्षिण की ओर राज्य का विस्तार शुरू किया था। मैसूर की बढ़ती ताकत से निजाम और मराठा उसके शत्रु बन गए थे।

साहस के साथ अंग्रेजों से मुकाबला किया

टीपू के पिता हैदर अली जब मैसूर के सुल्तान थे तब ही उनकी लड़ाई अंग्रेजों से शुरु हो चुकी थी। उनके पिता की मृत्यु पिता की मृत्यु दूसरे आंग्ल-मैसूर युद्ध के दौरान हो गई थी। इसके बाद टीपू ने मैसूर साम्राज्य की बागडोर संभाली और साहस के साथ अंग्रेजों से मुकाबला किया। टीपू का अंग्रेजों की हार का बड़ा कारण मराठों और निजाम ने अंग्रेजों के साथ संधि कर ली थी। अपनी कमजोर स्थिति को देखते हुए उसने भी अंग्रेजों से संधि करने का प्रस्ताव भेजा। इस पर ​अंग्रेजों को भी टीपू की शक्ति का अहसास हो चुका था।

अत: दोनों पक्षों में संधि हो गई। मार्च, 1784 में मंगलौर की संधि हुई। इस दौरान टीपू ने अपनी सेना को यूरोपीय पद्धति पर प्रशिक्षित करवाया। इसके लिए उसने फ्रांस के शासक नेपोलियन बोनापार्ट से संपर्क किया। अंग्रेजों ने इस संधि को पांच साल बाद तोड़ दी। जिसका कारण था ट्रावनकोर राज्य। अंग्रेजों ने निजाम और मराठों को साथ लेकर मैसूर पर पुन: आक्रमण कर दिया। टीपू ने भी अरब, काबुल और फ्रांस से मदद मांगी लेकिन उसे सहयोग नहीं मिला। इस समय भारत में गवर्नर जनरल लॉर्ड कार्नवालिस था।

उसने वर्ष 1792 में तीसरे आंग्ल-मैसूर युद्ध का ऐलान कर दिया। कार्नवालिस के नेतृत्व में अंग्रेज सेना ने श्रीरंगपटनम की ओर कूच किया। मैसूर की सेना को हार का सामना करना पड़ा और एक संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए टीपू को मजबूर किया गया। इसमें उसे करीब अपना आधा राज्य देना पड़ा। इस युद्ध में अंग्रेजों को बारामहल, डिंडीगुल और मालाबार का क्षेत्र मिला, जबकि मराठों को तुंगभद्रा का भू-भाग और निजाम को कृष्णा से पेन्नार तक का क्षेत्र मिला।

अंतिम युद्ध और टीपू सुल्तान की मौत

भारत में नए गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेजली को नियुक्त किया गया। वह चाहता था कि टीपू सुल्तान फ्रांसीसियों से मित्रता छोड़कर अंग्रेजों के साथ शामिल हो जाए। लेकिन टीपू ने ऐसा नहीं किया तो अंग्रेज उससे नाराज हो गए। वेलेजली ने टीपू के खिलाफ फरवरी, 1799 में युद्ध छेड़ दिया।

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4 मई, 1799 को श्रीरंगपटम अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया। टीपू सुल्तान मारा गया और उसके पुत्र ने आत्मसमर्पण कर दिया। कंपनी का कोयम्बटूर और श्रीरंगपटम एवं पर्वू के अन्य भू-भाग पर कब्जा हो गया। अंग्रेजों ने पुन: हिंदू वाडियार राजवंश को मैसूर की गद्दी पर बैठाया। मैसूर के साथ जुलाई 1799 में एक सहायक संधि की गई। अंग्रेज इतिहासकारों ने टीपू को धर्मांध शासक बताया है।

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