फणीश्वर नाथ रेणु का उपन्यास ‘मैला आंचल’, ‘गोदान’ के बाद का सबसे सफल हिंदी उपन्यास

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हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासकार फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ की 4 मार्च को 99वीं ब​र्थ एनिवर्सरी हैं। वह मुंशी प्रेमचंद के बाद के युग में आधुनिक हिंदी साहित्य के सबसे सफल और प्रभावशाली लेखकों में से एक थे। उन्होंने प्रसिद्ध आंचलिक उपन्यास ‘मैला आँचल’ लिखा जो प्रेमचंद के गोदान के बाद, सबसे सफल हिंदी उपन्यास माना जाता है।

फणीश्वर ने अपने समकालीन ग्रामीण भारत की आवाज़ को ‘आंचलिक उपन्यास’ (क्षेत्रीय कहानी) शैली के जरिए चित्रित कर हिंदी के अग्रणी लेखकों में शामिल हुए।

जीवन परिचय

फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म 4 मार्च, 1921 को बिहार के अररिया जिले के सिमराहा रेलवे स्टेशन के पास एक छोटे से गांव औराई हिंगना में हुआ था। वह मंडल समुदाय ​थे, जो एक विशेषाधिकार प्राप्त समुदाय था। उनके पिता शिलानाथ मंडल ​थे, जो भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय थे।

उनकी शिक्षा भारत और नेपाल में हुई। रेणु की प्राथमिक शिक्षा अररिया और फोर्ब्सगंज में हुई ​थी। उन्होंने बिराटनगर आदर्श विद्यालय (स्कूल), बिराटनगर, नेपाल से मैट्रिक किया। इंटरमीडिएट करने के बाद वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। वह भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जेल गए। बाद में वर्ष 1950 में उन्होंने नेपाली क्रांतिकारी आंदोलन में भी भाग लिया।

निजी जीवन

फणीश्वर नाथ ने तीन शादियां की थी। उनकी पहली पत्नी सुलेखा रेणु थी, जिनसे एक बेटी कविता हुई। उन्हें लकवा हो जाने की वजह से फणीश्वर ने दबाव में दूसरा विवाह एक विधवा पद्मा से किया। इनसे उनके तीन बेटे हुए। उनकी तीसरी शादी जब उन्हें पटना मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती करवाया गया तो वहां एक नर्स लतिका ने उनकी सार—संभाल की। इस दौरान रेणु उन पर आसक्त हो गए। बाद में उनसे शादी कर ली।

साहित्यिक सफर

फणीश्वर नाथ रेणु ने लेखन कार्य वर्ष 1936 में शुरु कर दिया। इस दौरान उनकी कुछ कहानियां प्रकाशित हुई, लेकिन वे अपरिपक्व कहानियां थी। जब वह वर्ष 1944 में जेल से बाहर आए तो उन्होंने अपनी पहली परिपक्व कहानी ‘बटबाबा’ लिखी। यह कहानी ‘साप्ताहिक विश्वमित्र’ के 27 अगस्त, 1944 के अंक में प्रकाशित हुई। बाद में ‘पहलवान की ढोलक’ वर्ष 1944 में ही प्रकाशित हुई। उनके जीवन की अंतिम कहानी 1972 में ‘भित्तिचित्र की मयूरी’ थी।

‘रेणु’ को जितनी प्रसिद्धि उपन्यासों से मिली, उतनी ही प्रसिद्धि उनको उनकी कहानियों से भी मिली। ‘ठुमरी’, ‘अगिनखोर’, ‘आदिम रात्रि की महक’, ‘एक श्रावणी दोपहरी की धूप’, ‘अच्छे आदमी’, ‘सम्पूर्ण कहानियां’, आदि उनके प्रसिद्ध कहानी संग्रह हैं।

फणीश्वरनाथ रेणु के प्रसिद्ध उपन्यास ‘मैला आंचल’ के लिए उन्हें 1970 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। रेणु ने आपातकाल के दौरान सरकारी दमन और शोषण के विरुद्ध ग्रामीण जनता के साथ प्रदर्शन करते हुए जेल गए। उन्होंने आपातकाल का विरोध करते हुए अपना ‘पद्मश्री’ का सम्मान भी लौटा दिया। इसी समय रेणु ने पटना में ‘लोकतंत्र रक्षी साहित्य मंच’ की स्थापना की।

उनकी लिखी हुई कहानी पर बॉलीवुड में बनी फिल्म

फणीश्वर की लिख कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर ‘तीसरी कसम’ नामक फिल्म बनी। इसके बाद वह काफी लोकप्रिय हो गये थे। आज भी ‘तीसरी कसम’ फिल्म हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर मानी जाती है। इस फिल्म केा बासु भट्टाचार्य ने डायरेक्ट किया था और इसके निर्माता सुप्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र थे। इस फ़िल्म में राजकपूर और वहीदा रहमान ने मुख्य भूमिका में अभिनय किया था।

निधन

फणीश्वर नाथ रेणु को ‘पैप्टिक अल्सर’ नामक बीमारी हो गई जिसके इलाज के दौरान 11 अप्रैल, 1977 को उनका निधन हो गया।

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