रघुपति सहाय उर्फ शायर फ़िराक़ गोरखपुरी ने ठुकरा दिया था राज्यसभा की सदस्यता का प्रस्ताव

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Firaq-Gorakhpuri-Bio

उर्दू भाषा के मशहूर शायरों में से एक फ़िराक़ गोरखपुरी को भला कौन नहीं जानता। फ़िराक़ ने एक ऐसे कलमगार के रूप में अपनी पहचान बनाई, जिनके शब्दों के जादू ने हर उम्र के लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया। उर्दू जुबां के इस अलहदा शायर की 3 मार्च को पुण्यतिथि है। यह उनकी कलम का ही कमाल था कि उन्हें रघुपति सहाय से फ़िराक़ गोरखपुरी बना दिया। अपने नाम में गोरखपुर शहर का नाम जोड़कर फ़िराक़ ने इस शहर को एक अलग पहचान दिलाई।

‘गुले नग़मा’ के लिए ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से सम्मानित किए गए

फ़िराक़ गोरखपुरी का जन्म 28 अगस्त, 1896 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। फ़िराक़ का वास्तविक नाम रघुपति सहाय था। उर्दू में काव्यकृति ‘गुले नग़मा’ के लिए फ़िराक़ को ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था। साहित्य के क्षेत्र में फ़िराक़ के उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा ‘पद्मभूषण पुरस्कार’ से भी नवाज़ा गया। 3 मार्च, 1982 को नई दिल्ली में उर्दू के इस मशहूर शायर ने दुनिया को अलविदा कह दिया। ऐसे में इस खास मौके पर पढ़िए फ़िराक़ गोरखपुरी की कुछ चुनिंदा शायरी..

पढ़िए फ़िराक़ गोरखपुरी की एवरग्रीन शायरियां—:

01.मौत का भी इलाज हो शायद
ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं

02.बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं

03.एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं

04.आए थे हँसते खेलते मय-ख़ाने में ‘फ़िराक़’
जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए

05.तुम मुख़ातिब भी हो क़रीब भी हो
तुम को देखें कि तुम से बात करें

06.अब तो उन की याद भी आती नहीं
कितनी तन्हा हो गईं तन्हाइयाँ

07.कुछ न पूछो ‘फ़िराक़’ अहद-ए-शबाब
रात है नींद है कहानी है

08.इक उम्र कट गई है तिरे इंतिज़ार में
ऐसे भी हैं कि कट न सकी जिन से एक रात

09.कोई समझे तो एक बात कहूँ
इश्क़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहीं

10.बहुत दिनों में मोहब्बत को ये हुआ मा’लूम
जो तेरे हिज्र में गुज़री वो रात रात हुई

11.हम से क्या हो सका मोहब्बत में
ख़ैर तुम ने तो बेवफ़ाई की

12.ये माना ज़िंदगी है चार दिन की
बहुत होते हैं यारो चार दिन भी

13.ग़रज़ कि काट दिए ज़िंदगी के दिन ऐ दोस्त
वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में

14.न कोई वा’दा न कोई यक़ीं न कोई उमीद
मगर हमें तो तिरा इंतिज़ार करना था

15.खो दिया तुम को तो हम पूछते फिरते हैं यही
जिस की तक़दीर बिगड़ जाए वो करता क्या है

16.कम से कम मौत से ऐसी मुझे उम्मीद नहीं
ज़िंदगी तू ने तो धोके पे दिया है धोका

17.तेरे आने की क्या उमीद मगर
कैसे कह दूँ कि इंतिज़ार नहीं

18.मैं हूँ दिल है तन्हाई है
तुम भी होते अच्छा होता

19.शाम भी थी धुआँ धुआँ हुस्न भी था उदास उदास
दिल को कई कहानियाँ याद सी आ के रह गईं

20.अपने फ़ेवरेट में शामिल कीजिए शेयर कीजिए
ज़रा विसाल के बाद आइना तो देख ऐ दोस्त

21.ज़िंदगी क्या है आज इसे ऐ दोस्त
सोच लें और उदास हो जाएँ

22.अब याद-ए-रफ़्तगाँ की भी हिम्मत नहीं रही
यारों ने कितनी दूर बसाई हैं बस्तियाँ

23.जो उन मासूम आँखों ने दिए थे
वो धोके आज तक मैं खा रहा हूँ

24.आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख़्र करेंगी हम-असरो
जब भी उन को ध्यान आएगा तुम ने ‘फ़िराक़’ को देखा है

25.देख रफ़्तार-ए-इंक़लाब ‘फ़िराक़’
कितनी आहिस्ता और कितनी तेज़

26.ये माना ज़िंदगी है चार दिन की
बहुत होते हैं यारो चार दिन भी

27.कोई आया न आएगा लेकिन
क्या करें गर न इंतिज़ार करें

28.लहू वतन के शहीदों का रंग लाया है
उछल रहा है ज़माने में नाम-ए-आज़ादी

29.तुझ को पा कर भी न कम हो सकी बे-ताबी-ए-दिल
इतना आसान तिरे इश्क़ का ग़म था ही नहीं

30.पर्दा-ए-लुत्फ़ में ये ज़ुल्म-ओ-सितम क्या कहिए
हाए ज़ालिम तिरा अंदाज़-ए-करम क्या कहिए

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