पंडित माखनलाल चतुर्वेदी ने कवि कर्म के लिए ठुकरा दिया था मुख्यमंत्री पद

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हिंदी साहित्य के ख्यातनाम ​कवि माखनलाल चतुर्वेदी की आज 4 अप्रैल को 133वीं जयंती है। वे एक प्रसिद्ध कवि होने के साथ ही पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी भी थे। उन्होंने अपनी लेखन शैली से देश के युवाओं में आजादी और देश प्रेम की भावना को खूब जगाए रखा। देश की आजादी के लिए न केवल कविता और लेख लिखकर लोगों में जोश भरा, बल्कि वे खुद कई आंदोलनों के दौरान जेल भी गये थे। पत्रकार के रूप में चतुर्वेदी की लेखन कला में विविधता थी। पत्रकारिता के माध्यम से उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त विघटनकारी ताकतों, कुप्रथाओं और संकीर्ण प्रवृत्तियों पर गहरी चोट कीं। समाज के कमजोर वर्ग और महिलाओं के अधिकारों के प्रति गहरी संवेदनशीलता उनके लेखन में स्पष्ट दिखाई देती थी। इस ख़ास मौके पर जानिए माखनलाल चतुर्वेदी के जीवन के बारे में कुछ अनसुनी बातें…

पं. माखनलाल चतुर्वेदी का जीवन परिचय

पंडित माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल, 1889 को मध्यप्रदेश के बावई गांव में हुआ था। उनके पिता नंदलाल चतुर्वेदी थे, जो गांव की एक प्राथमिक पाठशाला में अध्यापक थे। इनकी प्राथमिक शिक्षा गांव के ही स्कूल में हुईं, उसके बाद इन्होंने घर पर ही संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और गुजराती आदि भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। इन्हें राधा वल्लभ संप्रदाय से लगाव होने के कारण वैष्णव पद कंठस्थ थे। माखनलाल चतुर्वेदी का महज़ 15 वर्ष की आयु में विवाह हो गया।

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बतौर पत्रकार समाज के लिए रहा बड़ा योगदान

पं. माखनलाल चतुर्वेदी बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी थे। जहां वे एक ओजस्वी कवि थे, वहीं चतुर्वेदी एक कर्मठ पत्रकार भी थे। उन्होंने एक ज्वलंत पत्रकार के रूप में ‘प्रभा’, ‘कर्मवीर’ और ‘प्रताप’ का संपादन किया। इन्होंने वर्ष 1913 में ‘प्रभा पत्रिका’ का संपादन किया। इसी दौरान उनकी भेंट स्वतंत्रता सेनानी और पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी से हुईं। उनसे मिलकर माखनलाल बेहद प्रभावित हुए। इन्होंने वर्ष 1918 में प्रसिद्ध ‘कृष्णार्जुन युद्ध’ नाटक की रचना की और वर्ष 1919 में जबलपुर में ‘कर्मयुद्ध’ का प्रकाशन किया।

स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण वर्ष 1921 में माखनलाल चतुर्वेदी को गिरफ्तार कर लिया गया, इसके बाद वर्ष 1922 में ये रिहा हुए। वर्ष 1924 में गणेश शंकर विद्यार्थी की गिरफ्तारी के बाद इन्होंने ‘प्रताप’ का संपादन किया। ‘कर्मवीर’ के माध्यम से माखनलाल ने पत्रकारिता के मानक गढ़े, जो भारतीय पत्रकारिता की अनमोल विरासत हैं।

देश की आजादी में निभाई अहम भूमिका

चतुर्वेदी ने देश की आजादी के लिए गरम दल के नेता बाल गंगाधर तिलक के साथ-साथ स्वतंत्रता आंदोलन की लड़ाई में अपना अहम योगदान दिया। यहीं नहीं वे अहिंसा का मार्ग अपनाने वाले महात्मा गांधी से भी बहुत प्रभावित हुए और असहयोग आंदोलन के दौरान जेल भी गए। उनका राष्ट्र के प्रति प्रेम और समर्पण अप्रतिम था, जो उनकी कविताओं में भी साफ झलकता है। वे युवाओं के सच्चे हितैषी और मार्गदर्शक थे।

कवि माखनलाल चतुर्वेदी, गांधीजी से बहुत प्रभावित हुए और उनके बताये अहिंसक मार्ग को अपनाया, परंतु वे लंबे समय तक इसकी सीमा में बंधे नहीं रहे। वे विद्रोही भी थे। उनमें वैष्णव मधुर साधना, समर्पण आदि था। उन पर सूफ़ी​ विचारधारा का भी प्रभाव पड़ा। इन सब खूबियों के साथ ही वे सामाजिक क्रांतिकारी भी थे। उन्होंने रूस की समाजवादी क्रांति के समर्थन में ‘कर्मवीर’ लिखा है। वे लेनिन को ‘महात्मा’ लिखते थे और ‘कर्मवीर’ में लेनिन की पत्नी क्रुप्सकाया के संस्मरणों के आधार पर उन्होंने लेनिन के बारे में काफ़ी लिखा है।

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पंडित चतुर्वेदी को मिले सम्मान और पुरस्कार

वर्ष 1954 में साहित्य अकादमी पुरस्कारों की स्थापना के बाद हिन्दी साहित्य के लिए प्रथम पुरस्कार पं. माखनलाल चतुर्वेदी को ‘हिमतरंगिनी’ के लिए प्रदान किया गया। ‘पुष्प की अभिलाषा’ और ‘अमर राष्ट्र’ जैसी ओजस्वी रचनाओं के रचयिता इस महाकवि के कृतित्व को सागर विश्वविद्यालय ने वर्ष 1959 में डी. लिट्. की मानद उपाधि से विभूषित किया। वर्ष 1943 में उस समय का हिन्दी साहित्य का सबसे बड़ा ‘देव पुरस्कार’ माखनलाल जी को ‘हिम किरीटिनी’ के लिए दिया गया।

भारत सरकार द्वारा वर्ष 1963 में पंडित माखनलाल को ‘पद्मभूषण’ से अलंकृत किया गया। 10 सितंबर 1967 को राष्ट्रभाषा हिन्दी पर आघात करने वाले राजभाषा संविधान संशोधन विधेयक के विरोध में माखनलालजी ने यह अलंकरण लौटा दिया। 10 सितंबर, 1967 को ‘राजभाषा संविधान संशोधन विधेयक’ के विरोध में इन्होंने ‘पद्मभूषण पुरस्कार’ लौटा दिया था। यह विधेयक राष्ट्रीय भाषा हिंदी का विरोधी था। ‘एक भारतीय आत्मा’ के नाम से कविताएं लिखने के कारण उन्हें ‘एक भारतीय आत्मा’ की उपाधि दी गई थी।

हिन्दी साहित्य में योगदान व काव्य कृतियाँ:

बतौर लेखक, कवि और पत्रकार पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की भाषा सरल और ओजपूर्ण रहीं। प्रभा और कर्मवीर जैसे पत्रों के बतौर संपादक उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ जोरदार प्रचार किया। ‘हिमकिरीटिनी’, ‘हिम तरंगिणी’, ‘युग चरण’, ‘समर्पण’, ‘मरण ज्वार’, ‘माता’, ‘वेणु लो गूंजे धरा’, ‘बीजुरी काजल आँज रही’, ‘धूम्र वलय’ आदि उनकी प्रमुख पद्य कृतियां हैं।

गद्यात्मक कृतियाँ:

‘कृष्णार्जुन युद्ध’, ‘साहित्य के देवता’, ‘समय के पांव’, ‘अमीर इरादे: गरीब इरादे’ आदि हैं।

लेखन के लिए ठुकरा दिया था मुख्यमंत्री का पद

अपनी समकालीन हिन्दी कवयित्री महादेवी वर्मा ने उनके बारे में बताया था कि जब भारत स्वतंत्र हुआ तो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए पं. माखनलाल चतुर्वेदी को चुना गया। जब इन्हें इसकी सूचना दी गई तो इन्होंने कहा, ‘शिक्षक और साहित्यकार बनने के बाद मुख्यमंत्री बना तो मेरी पदावनति होगी।’ इस तरह माखनलालजी ने मुख्यमंत्री का पद ठुकरा दिया।

पं. माखनलाल चतुर्वेदी का निधन

देश के महान साहित्यकार पंडित माखनलाल चतुर्वेदी का निधन 80 वर्ष की आयु में 30 जनवरी, 1968 को मध्य प्रदेश के खण्डवा में हुआ।

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