ठोकर खाकर संभलना अच्छा, उससे सबक लेना और भी अच्छा

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हर शख्स चाहता है कि उसकी जिंदगी स्मूदली चलती रहे। किसी तरह की परेशानियां ना आएं। लेकिन हमारे सिर्फ सोचने भर से ऐसा नहीं होता। हम जिंदगी में ठोकर खाते हैं, पछताते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं। यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। क्या आपने कभी सोचा जब भी हम ठोकर खाते हैं तो असल में क्या होता है।

दरअसल जब भी जीवन में ठोकर लगती है, हम एक सबक सीखते हैं। हम यह जान पाते हैं कि फलां समस्या क्यों आई? कैसे उसने हमें नुकसान पहुंचाया? ठोकर खाकर संभलना बहुत अच्छी बात है लेकिन उससे भी अच्छी बात है उस ठोकर का विश्लेषण करना। यानी यह समझना कि ठोकर खाने के बाद हमने क्या किया और किस तरह एक इंसान के तौर पर हमने कुछ नया सीखा।

जिंदगी में जब भी परेशानी आती है, वह हमेशा कुछ ना कुछ सीखाकर जाती है। या यूं कहें कि यह परेशानी एक ऐसा स्ट्रीक्ट टीचर है जिसकी मार के पीछे बहुत बड़ा ज्ञान छिपा होता है। उस समय हम इसका अनुभव नहीं कर पाते लेकिन समय के साथ हमें पता चलता है कि टीचर का उस समय स्ट्रीक्ट होना कितना जरूरी था।

जब भी जिंदगी चोट दे तो पेरशान मत रहिए। जिंदगी को ​शुक्रिया कहें। वह आपको एक नया सबक दे रही है ताकि आप आने वाले दिनों में और बेहतर तरीके से जीवन जी सकें। यही सबक तो आपके अनुभव की किताब का पन्ना भरते हैं। फिर जब आप इन पन्नों को पलटते हैं तो पाते हैं कि मुश्किलों के दौर में आपने कितना कुछ सीख लिया।

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