दिल्ली हिंसा: आरोप-प्रत्यारोप का वक्त नहीं, बल्कि हर पहलू पर हो मंथन

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Delhi Violence

अफसोस होता है हम हर तरह से विज्ञान एवं तकनीक पर आश्रित हो गए हैं, लेकिन फिर भी हमारे जेहन से धर्म का भूत नहीं गया है। आज के समय में देश बड़ा है और वहां की सरकारें अपने लोगों के लिए हर वह सुविधा उपलब्ध करवा रही है जो अंतरराष्ट्रीय मानक पर सही है। धर्म क्या देता है, कभी नहीं लगा कि धर्म किसी गरीब व्यक्ति का पेट पालता है। हां, धर्म उच्च पद पर बैठे लोगों का जरूर भला करते हैं। धर्म के बड़े पदों पर बैठे लोगों की आजीविका बहुत ही शानदार चलती है।

धर्म के लोग धर्म के विरोधी क्यों हो जाते है?

धर्म केवल मानव का मानसिक, नैतिक और चारित्रिक उत्थान का मार्ग है, जो हमें परलोक के प्रति भी सजग करता है। किंतु कुछ नकारात्मक महत्त्वाकांक्षी व्यक्तियों ने इसे अपनी प्रतिष्ठा और आजीविका का मार्ग बना लिया है। अब तक हर धर्म में आए आडम्बरों को लेकर कई महापुरुषों ने उनमें सुधार किए हैं। जिनका बड़ा कारण है धर्माधिकारी लोगों पर आडम्बर थोपते हैं। सब धर्मों का लक्ष्य एक ही है, वह है मोक्ष। जिसे लोग भाषा और धर्मों के अनुसार अलग—अलग नामों से पुकारते हैं।

अगर कोई धर्म यदि यह कहता है कि लोगों को परलोक में सुख मिलेगा, तो यह कतई गलत है, क्योंकि जिसे हमने देखा नहीं उस पर क्या यकीन। हम तो वर्तमान में जीते हैं इसलिए हमें सुख यहां पर क्यों नहीं मिलता। सभी धर्म के बड़े अधिकारी यही करते हैं लोगों को भ्रमित करते हैं और खुद एशोआराम से जीवनयापन करते हैं। गरीब बेचार पेट काट कर उन बुद्धिजीवियों को पालते हैं। यही हो रहा है हर धर्म में और हर विचारधाराओं में। सबने लोगों को बांट रखा है।

धर्म सुख का आधार है या मानसिक शांति और नैतिक उत्थान का

अगर धर्म सुख का आधार है तो फिर एक ही धर्म के लोगों में ज्यादातर गरीब क्यों मिलते हैं। लोग लड़ते क्यों है? क्यों वेतन को लेकर असमानता है? क्यों एक धर्म या विचारधारा दूसरे धर्म या विचारधारा पर यकीन नहीं करती।

बहुत से प्रश्न है जो मानव को बांट देते हैं। कभी किसी धर्म ने यह नहीं कहा कि हम सब धर्मों की जननी धरती का श्रृंगार करने वाली प्रकृति है। जिसने न केवल धर्मों को पाला है ​बल्कि सम्पूर्ण जीवों को पाल रही है।

यह सच है जो चुतर और चालक है वह खुद को प्रतिष्ठित पद पर बैठ कर सुख भोगता है। कभी अमीर धर्माधिकारी गरीबों में अपनी पूंजी दान नहीं करता, कभी गरीबों के दु:ख—दर्द जानने नहीं जाता, हां ताज उनके सिर पर रहे, इसलिए लोगों को धर्म खतरे में है, कहकर भ्रमित करना जानते हैं।

सीएए पर दिल्ली में हिंसा का रूप

सीएए पर इसके समर्थक और विरोध करने वालों में हुई हिंसा का असली दोषी तो भड़काऊ भाषण देने वाले रहे हैं, लेकिन इसमें ज्यादातर मारे गए लोग निर्दोष थे। इस हिंसा में क्रूरता ने हदें पार कर दी एक शक्स को चाकू से 400 बार हमले किए गए।

दिल्ली हिंसा में मानवता के हर पहलू देखें गए। जहां लोग एक—दूसरे की जान के दुश्मन बन रहे थे वहीं कुछ लोगों ने धर्मों से ऊपर उठकर मानवता की सेवा की। दोनों समुदायों के लोगों ने एक—दूजे धर्मों के लोगों को बचाया। एक—दूसरे धर्म या लोगों पर आरोप—प्रत्यारोप लगाने से कोई फायदा नहीं है। सरकार को उन कट्टरपंथियों पर नकेल कसने की जरूरत है जो शांति में बाधक है।

धर्म को न हरा पाया विज्ञान

आज हर धर्म के लोग विज्ञान पर यकीन करते हैं तभी भौतिक वस्तुओं को बिना धर्म—कर्म से जोड़ इस्तेमाल कर रहे हैं। कितना कुछ बदल दिया विज्ञान ने परंतु नहीं बदला तो वह लोगों में धर्म को लेकर कट्टरता। आखिर क्या कमी रही विज्ञान में, जो मानव को धर्म के बंधन से मुक्त नहीं कर पाया। या फिर मानव को यह नहीं समझा पाया कि धर्म केवल मानव के नैतिक और मानसिक उत्थान के लिए जरूरी है।

विज्ञान ने चिकित्सा के माध्यम से मानव जाति को अनेक असाध्य रोगों से मुक्त किया है। तकनीक से मानव को बहुत संकटों से बचाया है। तकनीक से लोगों और अन्य धर्मों को समझने में सुविधा हुई है। आज के मानव को बड़े स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका विज्ञान की रही है।

फिर भी आज दुनिया के कई देश धर्म में धर्म को कट्टरता से अपनाए हुए हैं और हिंसात्मक उपद्रवों में सक्रिय है। कोई समझना नहीं चाहता है कि प्रकृति हमारी जननी है।

वक्त है प्रकृति के योगदान को समझने का

विज्ञान सचेत कर चुका है कि बढ़ते प्रदूषण से हमारी पृथ्वी संकट में है। किंतु इस ओर किसी का ध्यान नहीं है, बस ध्यान है तो एक धर्म का दूसरे धर्म के लोगों पर विजय कैसे हासिल की जाए। किसी भी धर्म या उसके बड़े धर्माधिकारी ने कभी बढ़ते पर्यावरण संकट पर ध्यान केंद्रित नहीं किया। और न ही कभी यह कहा कि बढ़ती जनसंख्या और साधन हमारी धरती के लिए खतरा है।

इन हालातों से तो लगता है कि मानव सभ्यता ने हजारों वर्षों बाद भी कोई विकास नहीं किया। क्योंकि धर्म से मिलने वाला सुख बड़े पदों तक सीमित होकर रह गया और विज्ञान की सुविधाएं भी शायद पैसों वालों तक ही सीमित होकर रह गई है। यही वजह बड़े लोग गरीबों को लड़ते हैं।

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