फिल्म हिट होने के बाद बिना नेटवर्क वाले पहाड़ों पर चले जाते थे शांतनू, ज्यादा काम से लगता था डर

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साल 2005 की फिल्म ‘परिणिता’ तो आपको याद ही होगी। इस फिल्म ने बहुत से लोगों के कॅरियर को नई दिशा दी। एक्ट्रेस विद्या बालन ने इसी फिल्म से बॉलीवुड में डेब्यू किया था, जिसके लिए उन्हें क्रिटिक्स की काफी सराहना मिली थी। विज्ञापन की दुनिया में काफी नाम कमा चुके प्रदीप सरकार ने भी इस फिल्म से डायरेक्शन की दुनिया में कदम रखा था। वहीं सैफ अली खान के कॅरियर ने भी इस फिल्म के बाद एक नये सफर की शुरूआत की थी।

साहित्यकार शरद चंद्र चटर्जी के उपन्यास परिणिता पर आधारित इस फिल्म को विधु विनोद चोपड़ा प्रोड्यूस कर रहे थे। वहीं इसका संगीत तैयार करने की जिम्मेदारी भी एक नए संगीतकार के कंधों पर थी, जिनका नाम है शांतनु मोइत्रा। शांतनु ने फिल्म में ‘पीयू बोले’, ‘सूना मन का आंगन’, ‘कैसी पहेली जिंदगानी’, ‘कस्तो मजा’ जैसे शानदार गाने तैयार किए, जिन्हें दर्शकों के बीच काफी लोकप्रियता मिली। फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर भी अच्छा प्रदर्शन किया।

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शांतिप्रिय जिंदगी जीने के लिए खोजा अनोखा तरीका :

‘परिणीता’ फिल्म के बाद शांतनु के टैलेंट की कद्र करने वालों की मानों लाइन लग गई। उनके पास इतने फोन आने लगे कि शांतिप्रिय जिंदगी बिताने वाले शांतनु के लिए ये सब संभालना काफी मुश्किल हो गया था। वो इन फोन कॉल्स से इतने परेशान हो गए कि इससे बचने के लिए उन्होंने एक अनोखा तरीका खोजा। वो ऐसे पहाड़ों पर चले गए, जहां मोबाइल का नेटवर्क ही नहीं आता था। बता दें कि फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ की सफलता के बाद भी उन्होंने ऐसा ही किया था।

ज्यादा काम करने से लगता था डर :

22 जनवरी 1968 को जन्मे शांतुन मोइत्रा ब्रांड मैनेजमेंट के बैकग्राउंड से थे। उन्हें संगीत में दिलचस्पी जरूर थी, मगर उन्होंने कभी भी इसे आय का जरिया बनाने का नहीं सोचा था। इसके पीछे की वजह ये थी कि उन्हें बहुत ज्यादा काम करने से डर लगता था। दरअसल उनका मानना था कि एक वक्त के बाद लोग सिर्फ आपके अच्छे काम को याद रखते हैं ना कि आपने कितना काम किया। लिहाजा वो दिल्ली में अपने परिवार के साथ ही सुकून का जीवन चाहते थे।

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दिल्ली से था खास लगाव :

संगीत में उनकी शुरूआत एक विज्ञापन के ज़रिए हुई थी, जिसका जिंगल आज भी लोगों की जुबां पर है : ‘बोले मेरे लिप्स, आई लव अंकल चिप्स’ ये विज्ञापन काफी हिट हुआ मगर शांतनु तब जिंगल्स की दुनिया में ही खुश थे। इसके बाद उन्हें गायिका शुभा मुद्गल के साथ एक सुपरहिट एलबम में काम करने का मौका मिला, जिसका नाम था ‘अबके सावन’। इस के बाद भी वो चितरंजन पार्क में अपने दोस्तों के साथ के चलते दिल्ली छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे।

जावेद अख्तर खींच लाए मुंबई :

शांतनु मोइत्रा को दिल्ली से निकालने का श्रेय जावेद अख्तर को जाता है। दरअसल एक कार्यक्रम के सिलसिले में दिल्ली आए जावेद अख्तर की मुलाकात शांतनु से हुई। तब उन्हें किसी ने बताया कि अबके सावन एलबम का संगीत शांतनु ने ही तैयार किया है। इसके बाद तो जावेद अख्तर, शांतनु मोइत्रा के लगभग पीछे ही पड़ गए कि उन्हें मुंबई चलना चाहिए। उन्होंने उस कार्यक्रम से जाने के बाद भी कई बार शांतनु मोइत्रा को फोन करके मुंबई आने का प्लान पूछा।

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यहां तक कि जावेद अख्तर ने अपने दोस्त सुधीर मिश्रा से ये तक कह दिया था कि वो अगर अपनी आने वाली फिल्म ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ में अच्छा संगीत चाहते हैं तो उन्हें शांतनु मोइत्रा से बात करनी चाहिए। जाहिर है जावेद अख्तर की सिफारिश मायने रखती थी। ऐसे में सुधीर मिश्रा ने शांतनु से बात की और ये तय हुआ कि शांतनु मोइत्रा एक महीने के लिए मुंबई में रहकर फिल्म का संगीत तैयार करेंगे। ये अलग बात है कि वो आज तक मुंबई में ही है।

मुंबई में ही जमने लगी दोस्तों की महफिल :

फिल्म ‘परिणिता’ के लिए शांतुन विधु विनोद चोपड़ा से मिलने जा रहे थे, तब ही जावेद अख्तर ने उनसे कह दिया था कि अब वो दिल्ली वापस लौटने का ख्वाब छोड़ दें। हालांकि बाद में शांतनु को अपने पुराने दोस्तों प्रसून जोशी, जयदीप साहनी और दिबाकर बनर्जी का साथ भी मुंबई में ही मिल गया था। ‘परिणिता’ के बाद ‘लगे रहो मुन्ना भाई’, ‘एकलव्य’, ‘थ्री इडियट्स’, ‘राजनीति’, ‘मद्रास कैफे’, ‘पीके’ जैसी फिल्मों ने शांतनु मोइत्रा को फिल्म इंडस्ट्री में अलग पहचान दिलाई।

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