अध्यक्ष पद पर बिना किसी गांधी के कांग्रेस मजबूत होगी या पार्टी में फूट ही पड़ जाएगी?

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ऊंचे पायदान पर बिना किसी गांधी के क्या कांग्रेस रहेगी? जिस पार्टी ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया और फिर दशकों तक चुनाव जीते वो पार्टी फिलहाल बड़े सवालों का सामना कर रही है। नरेन्द्र मोदी से बड़ी हार के बाद अब कांग्रेस की राज्य इकाइयों में बड़ी हलचल है। इसके अलावा अब तक साफ नहीं हो पाया है कि कांग्रेस को लीड अब कौन करेगा?

पार्टी के कई बड़े नेता नहीं चाहते हैं कि पार्टी के अध्यक्ष से राहुल गांधी इस्तीफा दें। चुनाव के तुरंत बाद राहुल गांधी ने इस्तीफे की पेशकश कर दी क्योंकि लोकसभा चुनाव में वे भारतीय जनता पार्टी को टक्कर नहीं दे पाए और हार की जिम्मेदारी ली।

चुनावों में अपनी असफलता की ही तरह राहुल गांधी यह प्रयास भी काफी हद तक पूरा नहीं हुआ। इस्तीफा देने की खबरों के एक महीने से अधिक समय बाद राहुल गांधी ने बुधवार को आधिकारिक रूप से अपने इस्तीफे की घोषणा करते हुए एक पत्र जारी किया।

तकनीकी रूप से कांग्रेस कार्य समिति को अभी भी इसे स्वीकार करना होगा यानि वे इसपर विचार करेंगे। लेकिन इस तरह की सार्वजनिक घोषणा के बाद और लगातार 42 दिनों से इस्तीफे की बारे में बात करते हुए राहुल गांधी ने साफ कर दिया है कि वो इस्तीफा देंगे ही।

बड़े परिवर्तन की जरूरत

लेटर में कई तरह की डिटेल्स राहुल गांधी ने जारी की हैं। उन्होंने लिखा कि “कई लोगों” को 2019 के चुनाव लिए जवाबदेह होना होगा लेकिन अध्यक्ष पद पर रहते हुए अपनी जिम्मेदारी को भी समझना होगा।

राहुल गांधी ने आगे कहा कि कि उनके द्वारा नए अध्यक्ष का चुनाव करना उचित नहीं होगा। उनका दावा है कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से प्रधानमंत्री, आरएसएस और उनकी संस्थाओं से लड़ाई की और कई बार वह पूरी तरह से अकेले खड़े थे। राहुल गांधी ने निष्कर्ष निकाला कि कांग्रेस पार्टी को खुद को मौलिक रूप से बदलना होगा और पावर की इच्छा का त्याग कर वैचारिक लड़ाई लड़नी होगी।

कांग्रेस पार्टी में ऐसी हलचल पहले कभी देखी नहीं गई ऐसे में ये कार्यवाही ठीक भी लगती है। सन् 2000 में कांग्रेस पार्टी ने राहुल गांधी को जनता से रूबरू करवाया था जिसके बाद साल 2017 में पार्टी का अध्यक्ष उन्हें नियुक्त किया गया।

कहा जा रहा है कि गांधी ने इस बात पर भी जोर दिया है कि मेरे बाद यह पद मेरे ही परिवार को ना दिया जाए जिससे पता चलता है कि राहुल गांधी इस मुद्दे की गंभीरता को समझते हैं।

क्या पार्टी अपने नए नेतृत्व के तहत खुद को फिर से मजबूत करने का रास्ता खोजेगी? क्या उस नए नेतृत्व को खोजने के लिए भी एक सिस्टम है? क्या पार्टी गांधी परिवार पर इतना निर्भर हो गई है कि राहुल गांधी के बाद इनमें फूट पड़ जाएगी?

कांग्रेस अतीत में गैर-गांधी अध्यक्षों द्वारा चलाई गई है और सफल भी हुई है। लेकिन वह तब था जब पार्टी काफी बड़ी हुआ करती थी। अब पार्टी बहुत कम जगह घेरती है। फिर भी सत्ता धारी मोदी के सामने एक नया अध्यक्ष रखकर पार्टी आने वाले 5 सालों में एक कड़ा विपक्ष तैयार कर सकती है लेकिन सवाल यही है क्या तब तक पार्टी संभली रह पाएगी?

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