दुनिया भर में समानता एक भ्रम है, इस डेटा तो से यही लगता है!

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सर्वनाम “he” का उपयोग अक्सर डिफॉल्ट रूप से “he या she” दोनों को संबोधित करने के रूप में किया जाता है लेकिन बहुत से लोग “he” सुनते ही एक आदमी की तस्वीर अपने दिमाग में बनाते हैं।

ब्रिटिश एक्टिविस्ट और लेखक कैरोलिन क्रिएडो पेरेज़ ने हैरान करने वाला शोध किया है। उन्होंने आंकड़ों के आधार पर यह बताया है कि कैसे दुनिया किसी पुरूष द्वारा पुरूष के लिए ही बनी है। आपको सुनने में अटपटा लग सकता है लेकिन शोध में कुछ फैक्ट्स को काम में लिया गया है।

स्मार्टफोन एक महिला की हथेली में आसानी से फिट नहीं होते हैं। बच्चों के लिए टीवी पर जो भी चुटकुले या नॉन ह्यूमन कैरेक्टर्स देखते हैं उनमें केवल 13% महिलाएं हैं बाकि कैरेक्टर आदमियों को ही दिखाया जाता है। इसके अलावा रिसर्च में सामने आया कि हार्ट अटैक से मरने की संभावना औरतों की ज्यादा होती है क्योंकि कभी इस बात ध्यान दिया ही नहीं गया कि महिलाओं में हार्ट अटैक के लक्षण पुरूषों से अलग होते हैं।

स्टडी के इस एक छोटे से उदहारण से इसको समझा जा सकता है। हम सभी के सामने कई तरह की स्टडी सामने आई है जिसमें पता चला है कि महिलाओं के हाथ पुरूषों की तुलना में छोटे होते हैं। स्मार्टफोन कंपनियां फिट टू अ मेन साइज के स्मार्टफोन डिजाइन करती है जिसे ही युनिवर्सल टू ऑल माना जाता है और महिलाओं के कम्फर्ट को वरीयता नहीं दी जाती है।

बुक में ऐसी कई चीजों को गहराई से बताया गया है। बहरहाल बुक में यह कहा गया है कि दुनिया में समानता तभी आ सकती है जब लोग बदलें।

अब ये तो रहा बाहर की स्टडी। खैर इससे पता लगाया जा सकता है कि भारत की क्या हालत होगी। भारतीय समाज अभी भी रूढ़ीवादी सोच से ग्रसित है। जिस भेदभाव की बात ये स्टडी कर रही है उसके बारे में भारत में तो कई उदहारण दिए जा सकते हैं।

आज भी समाज पितृसत्ता और पुरूष प्रधान समाज की मानसिकता से ग्रसित है। बड़ा तबका अभी भी औरतों को केवल घर तक ही सीमित रखता है। कहने में संकोच होना भी नहीं चाहिए कि भारत आजादी के इतने सालों बाद भी एक समानता से भरा समाज बनाने में कामियाब नहीं हो रहा है।

ऐसा नहीं है कि अंधेरा ही अंधेरा है। कुछ लोग सामने आ भी रहे हैं। बोल रहे हैं और समझ रहे हैं कि क्या गलत है और क्या सही। मगर फिर वही बात आ जाती है बदलाव से ही हो सकेगा सबकुछ और हथियार है शिक्षा।

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