स्पेशलः 20वीं शताब्दी के ‘तानसेन’ के रूप में जाने जाते थे उस्ताद बड़े गुलाम अली खान

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Ustad-Ghulam-Ali-Biography

शास्त्रीय म्यूजिक इतिहास की हम सभी को एक अनोखी देन है। कई संगीतकार हुए जो इसको पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाने चले गए और आज भी लोगों के दिलों में ये जिंदा है। जिसकी हम बात कर रहे हैं वो शख्सियत भी शास्त्रीय संगीत से ही जुड़ी है। पटियाला घराने के बड़े उस्ताद गुलाम अली खां के टेलेंट को कम शब्दों में बयां करना मुश्किल जाहिर होता है। उनकी तिलीस्म आवाज की कायल तो दुनिया आज भी है। वाराणसी की गलियां आज भी उनकी ठुमरी से गूंज उठती हैं। 25 अप्रैल को उस्ताद गुलाम अली की पुण्यतिथि है। ऐसे में इस मौके पर जानते हैं उनके बारे में दिलचस्प बातें…

उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ान (2 अप्रैल, 1902 – 25 अप्रैल, 1968) पटियाला घराने के एक हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक थे। अक्सर 20वीं शताब्दी के ‘तानसेन’ के रूप में उन्हें जाना जाता है। उस्ताद बड़े गुलाम अली खान भारत के महान शास्त्रीय गायकों में से एक थे।

उनके पिता अली बख्श खां भी काफी फेमस हुआ करते थे और सारंगी वादक और गायक हुआ करते थे। ट्रेनिंग मिली उन्हें अपने चाचा काले खां से जो खुद भी गायक और संगीतज्ञ थे। बात 1947 की है जब उस्ताद बड़े गुलाम अली खां बंटवारे की आग में लाहौर चले गए, लेकिन उसके बाद वह भारत वापस आ गए और यहीं बस रहे। 1957 में उनको भारत की नागरिकता दे दी गई।

पंडित नेहरू ही थे जिन्होंने उन्हें भारत की नागरिकता देने की बात कही थी। कहा जाता है कि नेहरू और गुलाम अली के बीच काफी अच्छे संबंध थे। उस्ताद गुलाम अली बड़ी महफिलों के किंग माने जाते हैं। और अपने बारे में वो कहा करते थे कि 1 घंटे तो उन्हें गला गर्म करने में लगता है।

अपने समय के सबसे प्रतिभाशाली गायकों में से एक गुलाम अली ने सबसे अच्छे और सबसे बुरे अनुभवों से भरा जीवन जीया लेकिन उस समय के दौरान भी उन्होंने कभी भी संगीत को कम नहीं होने दिया। उनकी आवाज़ में ऐसा टेलेंट था हर किसी मोह लेता था। शब्दों के खेल ने उनके गायन को काफी सजाया।

हालाँकि उनका संगीत करियर कुछ सालों तक चला लेकिन वह अपने लिए एक विशेष जगह बनाने में सफल रहे जिसने उन्हें इंडस्ट्री के बाकी खिलाड़ियों से अलग खड़ा कर दिया। उन्हें 1962 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

उस्ताद बड़े गुलाम अली खान का विवाह अली जिवाई से हुआ था जिनकी मृत्यु 1932 में हुई थी। 1930 में पैदा हुए उनके बेटे मुनव्वर अली खान भी एक महान शास्त्रीय गायक थे। वह अपने पिता के साथ 1968 में अपने पिता की मृत्यु तक अपने सभी संगीत कार्यक्रमों में शामिल हुए।

इसके बाद, उन्होंने सोलो प्रोग्राम देना जारी रखा, जो 1989 में उनकी मृत्यु पर फिर से समाप्त हो गया। उनके पोते, रज़ा अली खान अभी भी एक हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक हैं जिससे संगीत वंश के जादू और परंपरा को जीवित रखा गया है। उस्ताद बड़े गुलाम अली खान ने 25 अप्रैल 1968 को हैदराबाद के बशीरबाग पैलेस में एक लंबी बीमारी से पीड़ित होने के बाद अंतिम सांस ली।

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