4 दिन से जयपुर की सड़कों पर मौत का तांडव, क्या धारा 304-A एकदम कचरा हो गई है !

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अक्सर सुनने में आता है 4 दिन की ज़िंदगी है, मौत से बड़ा कोई सुख नहीं जैसी बातें…पर अच्छी खासी चलती ज़िन्दगी में अचानक मौत का आ जाना हर किसी के लिए भयावह होता है। जब आपके मौत की वजह पर आपके पीछे लोग बेसुध होकर मातम मनाते हैं, उस मौत से बड़ा इस दुनिया में कोई गम नहीं हो सकता।

बात का सन्दर्भ गुलाबी नगरी जयपुर का है, जहां जवाहरलाल नेहरू मार्ग के जेडीए चौराहे पर पिछले 4 दिनों से मौत तेज रफ्तार से दौड़ रही है। बीते मंगलवार से चौराहा रफ्तार के कहर का गवाह बन रहा है।

मंगलवार (16 जुलाई) को जहां 100 की स्पीड से भी तेज दौड़ती कार ने लाल बत्ती पर खड़े 2 युवकों (सगे भाई) की जान ले ली। साथ ही अन्य लोगों को बुरी तरह लहूलुहान कर अस्पताल पहुंचा दिया जहां वो ज़िन्दगी-मौत की जंग लड़ रहे हैं।

आंखों से अभी 60 फीट दूर उछले पुनीत और विवेक की तस्वीर धुंधली हुई ही नहीं थी कि शुक्रवार (19 जुलाई) को फिर एक और दर्दनाक वीडियो सोशल मीडिया पर घूमता हुआ आता है।

जेडीए सर्कल पर सुबह 6 बजे तेज रफ्तार से आते ऑडी चालक विकास शर्मा ने क्रॉसिंग पर 57 साल के बाइक सवार अभय चंद डागा को टक्कर मार दी जिसके बाद वो करीब 30 फीट हवा में उछल गए। बताया जा रहा है कि विकास ने रात भर शराब पार्टी की जिसके बाद सुबह तक उसका हैंगओवर उतरा नहीं था। विकास के पिता माइन्स बिजनेस से जुड़े हैं। वहीं अभय डागा की हालत ताजा जानकारी मिलने तक गंभीर है।

पुनीत और विवेक की मौत का कौन जिम्मेदार ?

16 जुलाई को हुई दुर्घटना के बाद कार चालक वीरेन्द्र जैन को गिरफ्तार कर लिया गया और मृतक भाइयों के परिवारवालों की ओर से वीरेन्द्र जैन के खिलाफ आईपीसी की धारा 304-ए में मामला दर्ज किया। राजस्थान पुलिस ने गैर इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज नहीं किया जिसमें धारा 304 के तहत केस दर्ज होता। ऐसे में कार चालक वीरेन्द्र जैन 20 घंटे में जमानत पर बाहर आ गए।

धारा 304-ए क्या है ?

आईपीसी की धारा 304 (ए) उन लोगों पर लगती है जिनकी लापरवाही (तेजी व लापरवाही से वाहन चलाना) से किसी की जान चली जाती है। इस धारा में अपऱाध को जमानती माना जाता है और 2 साल तक की सजा या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। सड़क दुर्घटना के मामलों में अक्सर यही धारा लगाई जाती है।

दूसरे शब्दों में कहें तो यह धारा तब ही लागू होती है जहां किसी को मारने का कोई इरादा नहीं है, और इस बात का ज्ञान भी नहीं है कि मेरे इस काम से किसी की मौत हो जाएगी।

कानून के जानकारों ने काफी समय से इस धारा पर सवाल खड़े किए हैं कि क्या यह धारा बिना किसी इरादे के किसी को जान से मारने पर सजा दे पाती है या लोगों को लापरवाही की आड़ में ‘हत्या करने का लाइसेंस’ मिल जाता है।

हम सड़क दुर्घटनाओं को लेकर इतना आदी हो चुके हैं कि घटना के 2-3 दिन बाद इतने सामान्य हो जाते हैं कि हमारी लचर कानून व्यवस्था पर सवाल उठाने की जहमत नहीं करते हैं। आज भी कई धाराएं ऐसी हैं जिनके तहत इस तरह की घटनाओं में दी जाने वाली सजा कम या ना के बराबर होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2018 की एक रिपोर्ट कहती है कि पूरी दुनिया में भारत सड़क दुर्घटनाओं के मामले में सबसे आगे है।

भारत का यहां नंबर वन होना सड़क सुरक्षा कानूनों की लचर हालत को साफ दिखाता है। वहीं सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की 2017 की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में हर साल लगभग 5 लाख सड़क दुर्घटनाओं में 1 लाख से ज्यादा बेमौत मारे जाते हैं।

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