स्टीव जॉब्स: वह शख़्स जिसने एप्पल को बनाई दुनिया की सबसे महंगी कंपनी

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Steve-Jobs

एप्पल इंक के को-फाउंडर एवं पूर्व सीईओ स्टीव जॉब्स की 5 अक्टूबर को आठवीं पुण्यतिथि है। जॉब्स की 5 अक्टूबर, 2011 को कैंसर जैसी घातक बीमारी से जूझते हुए मौत हो गई थी। उनका पूरा नाम स्टीव पॉल जॉब्स था। उन्होंने दुनिया को अलविदा कहने से पहले एप्पल कंपनी को वो नाम और प्रसिद्धि दिलाई जिसको आज बच्चा-बच्चा जानता है। एप्पल कंपनी के उत्पाद ख़ासकर आईफोन और मैक बुक लैपटॉप के आज भी लोग कायल हैं।

यह स्टीव का ही बिजनेस माइंड था कि आज एप्पल दुनिया की टॉप टेक कंपनियों में से एक है। वे दिग्गज एनीमेशन कंपनी पिक्सर एनीमेशन के भी सीईओ थे। यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि स्टीव को सफ़लता का ज्ञान भारत से ही मिला था। वे आज भले ही इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन अपने कई शानदार इनोवेशंस से करोड़ों लोगों के दिलों में बसते हैं। उनकी लाइफ बड़ी प्रेरणादायक रही है। ऐसे में स्टीव जॉब्स की डेथ एनिवर्सरी के अवसर पर जानते हैं उनकी ज़िंदग़ी के बारे में कुछ दिलचस्प बातें..

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अपने माता-पिता के गोद आए थे स्टीव

स्टीव जॉब्स का जन्म 24 फरवरी, 1955 को अमेरिका के कैलिफोर्निया प्रांत स्थित सैन फ़्रांसिस्को शहर में हुआ था। स्टीव को पॉल और क्लारा जॉब्स दंपती ने गोद लिया था। हालांकि, स्टीव की मां चाहती थीं कि उनके बच्चे को वह जोड़ा गोद ले जो कम से कम स्नातक उत्तीर्ण हो और जॉब्स दंपती ग्रेजुएट पास नहीं था। लेकिन इस जोड़े ने स्टीव की मां को भरोसा दिलाया कि वे उनके बेटे को उच्च शिक्षा दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। इस तरह दुनिया के सफ़लतम बिजनेसमैन्स में से एक स्टीव जॉब्स का लालन-पालन गोद लेने वाले जॉब्स दंपती ने किया था।

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गैरेज से हुई एप्पल कंपनी की शुरुआत

करीब पिछले एक दशक से दुनिया की सबसे कीमती कंपनियों में से एक एप्पल इंक की शुरुआत एक गैरेज में हुई थी। एक छोटे गैरेज से शुरु हुए सफ़र ने इस दुनिया को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। ये सब शुरु हुआ स्टीव जॉब्स के सपनों से, जिसे उन्होंने हकीक़त में तब्दील कर दिखाया। एक दिलचस्प बात यह है कि स्टीव ने पहले सेमेस्टर के बाद ही कॉलेज जाना छोड़ दिया था, ताकि वह पैसे बचा सके। इस दौरान वे कोक की बोतलें बेचते और पैसे बचाने के चक्कर में मीलों पैदल चलते थे। पूरे वीक में एक दिन अच्छा खाना खाने के लिए स्टीव अपने शहर के हरे-कृष्णा मंदिर में जाते थे। वे एक बौद्ध सन्यासी बनना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने अपना सिर भी मुंडवा लिया था। बाद में स्टीव भारत आए और कई आश्रमों में ज्ञान व शांति का पाठ पढ़ा।

साल 1976 में स्टीव जॉब्स ने अपने दोस्त स्टीव वोजनिक और रोनाल्ड वेयन के साथ एप्पल शुरू किया। हालांकि, उनके एक साझेदार रोनाल्ड ने दो हफ़्ते बाद ही 800 डॉलर लेकर खुद को एप्पल से अलग कर लिया था। एप्पल को ऊंचाइयों पर ले जाने वाले स्टीव की ज़िदग़ी में एक दौर ऐसा भी आया जब उन्हें उनकी ही बनाई इस कंपनी से बाहर कर दिया गया था। हालांकि बाद में न सिर्फ स्टीव एप्पल में वापस आए बल्कि इसे अपने दम पर नई बुलंदियों पर ले गए। लगभग एक दशक तक स्टीव जॉब्स ने 1 डॉलर प्रतिमाह तनख्वाह पर काम किया।

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अपने एक बच्चे को अपनाने से किया था इंकार

ग्रेट आंत्रप्रन्योर स्टीव जॉब्स चार बच्चे पिता थे। एक बच्चा जो उनकी गर्लफ्रेंड वेडोल्क से था, उसे शुरुआत में स्टीव ने अपनाने से इनकार कर दिया था। हालांकि, बाद में न सिर्फ स्टीव ने उसे अपनाया बल्कि दोनों के बीच शानदार रिश्ता रहा। स्टीव ने एक कम्प्यूटर का नाम भी उसके नेम पर रखा था। ​एक और दिलचस्प बात ये है कि स्टीव जॉब्स आज करोड़ों युवाओं के आदर्श हैं, लेकिन उन्होंने सालों तक अपनी मर्सडीज बिना लाइसेंस के चलाई थीं।

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स्टीव नौकरी छोड़कर आध्यात्मिक ज्ञान के लिए आए थे भारत

एप्पल को दुनिया में टॉप पर ले जाने वाले स्टीव जॉब्स साल 1974 में खुद को जानने के लिए भारत अपने दोस्त के साथ भारत आए थे। वे नैंनीताल में नीम करौली बाबा से मिलने के लिए दोस्त डेनियल कोटटके के साथ भारत आए। पहले वे दिल्ली से सीधे हरिद्वार पहुंचे। उस वक़्त हरिद्वार में महाकुंभ का मेला चल रहा था। उन्हें हर तरफ साधु-संत दिखाई दे रहे थे। कुंभ की जबरदस्त भीड़ और अजीब-गरीब लोगों को देख स्टीव घबरा गए। वे वहां से नैनीताल स्थित कैंची मंदिर पहुंचे। यहां नीम करौली बाबा का आश्रम था। अपने चमत्कारों के लिए विश्व विख्यात बाबा के विचारों से स्टीव प्रभावित थे।

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स्टीव जॉब्स को वहां नीम करौली बाबा नहीं मिले। स्टीव के पहुंचने से पहले ही बाबा का देहांत हो चुका था। लेकिन वे करौली बाबा के आश्रम में ही रुक गए। वहां स्टीव को वो अद्भुत किताब ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ एन योगी’ मिली, जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी थी। इस किताब को स्टीव ने कई बार पढ़ा था। इसी किताब के बारे में एक बार स्टीव जॉब्स ने बताया था कि उस बुक ने उनके सोचने का नज़रिया और विचारों को बदलकर रख दिया। स्टीव एक खोजकर्ता, आविष्कारक थे इसलिए उन्होंने एक कंपनी छोड़ी तो दूसरी बनाने की सोची। गौरतलब है कि स्टीव जॉब्स के नाम 300 से ज्यादा पेटेंट दर्ज़ हैं।

 

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