सरकार के ख़िलाफ़ बोलने पर गिरफ़्तार कर लिए गए थे मशहूर शायर अहमद फ़राज़

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Ahmad-Faraz-Biography

अहमद फ़राज़ उर्दू साहित्य की दुनिया का वो नाम है, जिससे हर पीढ़ी के लोग वाकिफ़ हैं। फ़राज़ का वास्तविक नाम सैयद अहमद शाह था, मगर लोगों के बीच वे अपने उपनाम अहमद फ़राज़ से पहचाने गए। उर्दू साहित्य की दुनिया में फ़राज़ अपनी इश्कियां और विरोधी कविताओं के लिए जाने जाते हैं। 25 अगस्त, 2008 को पाकिस्तान के इस्लामाबाद स्थित एक अस्पताल में गुर्दा फेल हो जाने के कारण फ़राज़ ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था। ऐसे में आज उनकी 13वीं पुण्यतिथि पर जानिए उनके जीवन के बारे में कुछ अहम बातें…

जिस यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की उसी में लग गए लेक्चरर

मशहूर शायर अहमद फ़राज़ का जन्म 12 जनवरी, 1931 पाकिस्तान के कोहट में हुआ था। उनका बचपन का नाम सैयद अहमद शाह था। वह प्रसिद्ध पाकिस्तानी उर्दू कवि थे। उनको बीसवीं सदी के महान उर्दू कवियों में भी गिना जाता है। फ़राज़ उनका तखल्लुस यानि उपनाम था। उन्होंने पेशावर यूनिवर्सिटी से फ़ारसी और उर्दू की पढ़ाई की और बाद में वहीं लेक्चरर लग गए। जब सैनिक हाकिमों ने उनको सरकार के ख़िलाफ़ बोलने पर गिरफ़्तार किया, तो वह छह साल देश के बाहर रहे। उन्होंने हमेशा ही नाइंसाफ़ी के विरुद्ध आवाज़ उठाईं।

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रेडियो पाकिस्तान में नौकरी की, कई अहम पदों पर रहे

अहमद फ़राज़ ने रेडियो पाकिस्तान में भी नौकरी की थी। फिर वह अध्यापन से भी जुड़े। जैसे-जैसे उनकी प्रसिद्धि बढ़ती गई उनके पद में भी वृद्धि होती रही। वह वर्ष 1976 में पाकिस्तान एकेडमी ऑफ लेटर्स के डायरेक्टर जनरल और फिर उसी एकेडमी के चेयरमैन भी बने। वर्ष 2004 में पाकिस्तान सरकार ने उन्हें ‘हिलाल-ए-इम्तियाज़’ पुरस्कार से अलंकृत किया। लेकिन साल 2006 में उन्होंने यह पुरस्कार इसलिए वापस कर दिया कि वे सरकार की नीति से सहमत और संतुष्ट नहीं थे। उन्हें क्रिकेट खेलने का भी काफी शौक था। लेकिन शायरी का शौक उन पर ऐसा छाया कि वे अपने समय के ग़ालिब कहलाए। उनकी शायरी के कई संग्रह प्रकाशित हुए। ग़ज़लों के साथ ही उन्होंने नज़्में भी लिखीं। लेकिन लोग उनकी ग़ज़लों के जबरदस्त दीवाने हैं।

सैन्य शासकों की जिया-उल-हक युग के दौरान आलोचना की

शायर फ़राज़ को उन कविताओं को लिखने के लिए गिरफ्तार किया गया, जिसमें पाकिस्तान के सैन्य शासकों की जिया-उल-हक युग के दौरान आलोचना की थी। उनकी गिरफ्तारी के बाद उनका काफी समय आत्म-निर्वासित निर्वासन में चला गया। पाकिस्तान लौटने से पहले वह ब्रिटेन, कनाडा और यूरोप में 6 साल तक रहे, जहां उन्हें पाकिस्तान अकादमी ऑफ लेटर के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया था और बाद में कई वर्षों से इस्लामाबाद स्थित नेशनल बुक फाउंडेशन के अध्यक्ष बनाए गए थे। अहमद फ़राज को उनके जीवनकाल में कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

उन्होंने अपने लेखों का उल्लेख किया और कहा: ‘अब मैं केवल तब लिखता हूं जब मैं अंदर से मजबूर हूं।’ अपने संरक्षक, क्रांतिकारी फैज़ अहमद फैज़ द्वारा स्थापित परंपरा को बनाए रखने के दौरान उन्होंने अपने निर्वासन के दिनों में कुछ बेहतरीन कविताएं लिखीं। प्रतिरोध की कविता के तौर पर ‘महासार’ प्रसिद्ध है। फ़राज़ का अभिनेता शाहजादा गफ़र ने पोथवारी/ मिरपुरी टेलीफिल्म ‘खाई ऐ ओ’ में भी उल्लेख किया।

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फ़राज़ के ग़ज़ल/नज़्म संग्रह निम्न हैं-

उर्दू शायर अहमद फ़राज़ की ग़ज़लों और नज़्मों के कई संग्रह प्रकाशित हुए हैं, जिनमें चांद और मैं, नयाफ़त, दर्द आशोब, पस अंदाज़-ए-मौसम, शहर-ए-सुख़न अरासता है (कुलीयात), तन्हा तन्हा, शब-ए-ख़ूं, बे आवाज़ गली कूचों में, जानां जानां, नाबीना शहर में आईना, सब आवाज़ें मेरी हैं, ये मेरी ग़ज़लें वे मेरी नज़्में, ख़ानाबदोश और ज़िंदगी व ऐ ज़िंदगी। खानाबदोश, ज़िंदगी! ऐ ज़िंदगी और दर्द आशोब (ग़ज़ल संग्रह) और ये मेरी ग़ज़लें ये मेरी नज़्में (ग़ज़ल और नज़्म संग्रह) शामिल हैं।

अहमद फ़राज़ की कुछ लोकप्रिय नज़्में…

“दिल को तिरी चाहत पे भरोसा भी बहुत है
और तुझ से बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता”

“अब के हम बिछड़े तो शायद ख्वाबों में मिले,
जिस तरह सूखे फूल किताबो में मिले।”

“इससे पहले की बेवफ़ा हो जाए,
क्यों न ए दोस्त जुदा हो जाये।”

“तुम तकल्लुफ़ को भी इख़्लास समझते हो ‘फ़राज़’
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला”

“रंजिश ही सही दिल दुखने के लिए आ,
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ।”

“ज़िंदगी से यही गिला है मुझे
तू बहुत देर से मिला है मुझे”

“आँख से दूर न हो दिल से उतर जायेगा,
वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जायेगा।”

“और ‘फ़राज़’ चाहिएँ कितनी मोहब्बतें तुझे
मांओं ने तेरे नाम पर बच्चों का नाम रख दिया”

“किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा”

“उस शख्स को बिछड़ने का सलीका भी नहीं,
जाते हुए खुद को मेरे पास छोड़ गया।”

“हम को अच्छा नहीं लगता कोई हमनाम तिरा
कोई तुझ सा हो तो फिर नाम भी तुझ सा रक्खे”

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