शांति स्वरूप भटनागर: भारतीय वैज्ञानिक जिनकी स्मृति में दिया जाता है विज्ञान के क्षेत्र में पुरस्कार

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Shanti Swarup Bhatnagar

भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिकों में से एक डॉ शांति स्वरुप भटनागर की 21 फरवरी को 126वीं बर्थ एनिवर्सरी हैं। वह एक भातरीय कोलाइड केमिस्ट, अकादमिक और वैज्ञानिक प्रशासक ​थे। वह वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के पहले महानिदेशक, उन्हें भारत में “अनुसंधान प्रयोगशालाओं के जनक” के रूप में सम्मानित किया जाता है। डॉ भटनागर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी.) के पहले अध्यक्ष भी बनाए गए थे।

वर्ष 1958 में उन्हें और उनके कार्यों को सम्मानित करने के लिए भारतीय वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के लिए शांति स्वरुप भटनागर पुरस्कारों की स्थापना की। इन्हें विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले व्यक्तियों को प्रदान किया जाता है।

जीवन परिचय

शांति स्वरुप भटनागर का जन्म 21 फरवरी, 1894 को शाहपुर जिले (अब पाकिस्तान में) के भेरा नामक गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम परमेश्वरी सहाय भटनागर था। जब वह आठ महीने के थे तब उनके पिता का देहांत हो गया था। जिसके बाद उनका बचपन नाना के घर ​गुजरा। उनके नाना एक इंजीनियर थे। इस कारण से बालक शांति को विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने लुभाया। बचपन से ही उन्हें खिलौने, इलेक्ट्रानिक बैटरियां और तारयुक्त टेलीफोन बनाने का शौक रहा। यही नहीं उनमें काव्य और कविता करने की रुचि भी विकसित हुई।

उनकी आरंभिक शिक्षा दयानंद एंग्लो-वैदिक हाई स्कूल, सिकंद्राबाद (बुलंदशहर) में संपन्न हुई। वर्ष 1911 में उन्होंने लाहौर के नव-स्थापित दयाल सिंह कॉलेज में दाखिला लिया। यहां पर वह ‘सरस्वती स्टेज सोसाइटी’ के सक्रिय सदस्य बन गए। शांति ने यहां पर एक कलाकार के रूप में अच्छी ख्याति अर्जित कर ली थी। उन्होंने उर्दू में ‘करामाती’ नामक एक नाटक लिखा। इस नाटक के अंग्रेजी अनुवाद ने उन्हें ‘सरस्वती स्टेज सोसाइटी’ का वर्ष 1912 का ‘सर्वश्रेष्ठ नाटक’ पुरस्कार और पदक दिलवाया।

उन्होंन वर्ष 1913 में पंजाब विश्वविद्यालय से इंटरमीडिएट परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की। इसके बाद उन्होंने लाहौर के फॉरमैन क्रिश्चियन कॉलेज में एडमिशन लिया। यही से उन्होंने वर्ष 1916 में बीएससी और वर्ष 1919 में रसायन शास्त्र में एमएससी की परीक्षा उत्तीर्ण की।

विदेशो से उच्च शिक्षा और शोध

शांतिस्वरुप भटनागर को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए ‘दयाल सिंह ट्रस्ट’ से विदेश में रहकर पढने के लिए छात्रवृति मिली। वह अमेरिका गए। लेकिन उस समय प्रथम विश्वयुद्ध की वजह से जहाज़ की सभी सीटों को अमेरिकी सेनाओं के लिए आरक्षित कर दिया गया था। इस वजह से ट्रस्टी ने उन्हें यूनिवर्सिटी कॉलेज लन्दन में रशायन शास्त्र के प्रोफेसर फ्रेडरिक जी. डोनन की देखरेख में पढ़ने की अनुमति दे दी। वर्ष 1921 में उन्होंने डॉक्टर ऑफ़ साइंस (डी.एस.सी.) की उपाधि भी अर्जित कर ली। उनके लन्दन प्रवास के दौरान वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसन्धान विभाग ने उन्हें £250 सालाना की फैलोशिप भी मिली।

कॅरियर

भटनागर वर्ष 1921 में भारत वापस आ गए और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में रशायन शास्त्र के प्रोफेसर नियुक्त किए गए। यहां पर तीन साल तक अध्यापन कार्य किया। उन्होंने विश्वविद्यालय के कुलगीत की भी रचना की। बाद में वह लाहौर चले गए जहां उन्हें पंजाब यूनिवर्सिटी में ‘फिजिकल केमिस्ट्री’ का प्रोफेसर व विश्वविद्यालय के राशायनिक प्रयोगशालाओं का निदेशक नियुक्त किया गया। यह उनके वैज्ञानिक जीवन की सबसे महत्वपूर्ण अवधि थी जिसके दौरान उन्होंने मौलिक वैज्ञानिक शोध किया। इस दौरान उन्होंने इमल्संस, कोल्लोइड्स और औद्योगिक रशायन शास्त्र पर शोध कार्य किए, पर ‘मैग्नेटो-केमिस्ट्री’ के क्षेत्र में उनका योगदान सबसे अहम रहा।

वर्ष 1928 में उन्होंने के एन माथुर के साथ मिलकर ‘भटनागर-माथुर मैग्नेटिक इन्टरफेरेंस बैलेंस’ का आविष्कार किया। यह चुम्बकीय प्रकृति ज्ञात करने के लिए सबसे संवेदनशील यंत्रों में एक था। इसका प्रदर्शन सन 1931 में ‘रॉयल सोसाइटी के भोज’ में किया गया था। बाद में एक ब्रिटिश कम्पनी ने इसका उत्पादन भी किया गया।

आजादी के बाद उन्होंने होमी जहाँगीर भाभा, प्रशांत चन्द्र महालानोबिस, विक्रम साराभाई और दूसरे अन्य वैज्ञानिकों के साथ-साथ देश में विज्ञान एवं तकनीक के आधारभूत ढांचे और नीतियों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रयोगशालाओं के निर्माण में योगदान

भटनागर ने व्यावहारिक रसायन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किया और ‘नेशनल रिसर्च डेवलपमेंट कारपोरेशन’ (एन.आर.डी.सी.) की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एन.आर.डी.सी. की भूमिका है शोध और विकास के बीच अंतर को समाप्त करना। उन्होंने देश में ‘औद्योगिक शोध आन्दोलन’ के प्रवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आजादी के बाद वर्ष 1947 में वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की स्थापना, शांति स्वरुप भटनागर के नेतृत्व में की गई। उन्हें सी.एस.आई.आर का प्रथम महा-निदेशक भी बनाया गया। डॉ भटनागर को ‘शोध प्रयोगशालाओं का जनक’ कहा जाता है। उन्होंने भारत में अनेकों बड़ी रासायनिक प्रयोगशालाओं के स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

डॉ भटनागर ने भारत में कुल बारह राष्ट्रीय प्रयोगशालाएं स्थापित कीं, जिनमें प्रमुख इस प्रकार से हैं:

केन्द्रीय खाद्य प्रोसैसिंग प्रौद्योगिकी संस्थान (मैसूर), राष्ट्रीय रासायनिकी प्रयोगशाला (पुणे), राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला (नई दिल्ली),
राष्ट्रीय मैटलर्जी प्रयोगशाला, जमशेदपुर,
केन्द्रीय ईंधन संस्थान, धनबाद

डॉ शांति स्वरुप भटनागर को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भारत सरकार ने वर्ष 1954 में पद्मभूषण से सम्मानित किया।

निधन

डॉ शांति स्वरुप भटनागर का 1 जनवरी, 1955 को हार्ट अटैक आने से देहांत हो गया।

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