सैम मानेकशॉ: 1971 की लड़ाई के वो हीरो जिन्होंने पाकिस्तान के ​दो टुकड़े कर दिए

Views : 2931  |  4 minutes read
Sam-Manekshaw-Biography

भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की 3 अप्रैल को 108वीं जयंती है। अपने बेबाक और खुशमिजाज स्वभाव के कारण भारतीय सैनिक में ही नहीं, बल्कि दुश्मन देश के सैनिकों के दिलों में भी उनके प्रति सम्मान था। मानेकशॉ ने अपनी सुझबूझ और दूरदृष्टि से वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध में अभूतपूर्व सफलता दिलाई और पाकिस्तान के दो टुकड़े कराते हुए बांग्लादेश की आज़ादी में अपना अहम योगदान दिया। सैम मानेकशॉ को प्यार से कई नामों से बुलाया जाता है। उनमें से ‘सैम बहादुर’ एक है। मानेकशॉ भारतीय सेना के पहले ऐसे ऑफिसर थे जिन्हें ​फील्ड मार्शल रैंक पर पदोन्नति दी गई। उनकी बहादुरी और सादगी के किस्से आज भी लोगों की जुबां पर है। ऐसे में इस खास मौके पर जानते हैं उनके जीवन के बारे में कुछ दिलचस्प बातें…

फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का जीवन परिचय

सैम मानेकशॉ का उनका जन्म 3 अप्रैल, 1914 को पंजाब के अमृतसर में एक पारसी परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम सैम होर्मूसजी फ्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ था। उनका परिवार गुजरात के वलसाड से अमृतसर आया था। मानेकशॉ के पिता भी ​ब्रिटिश- इंडिया आर्मी में मेडिकल सर्विस में कैप्टन पद पर रहे थे। सैम अपने छह भाई-बहनों में पांचवें नंबर के थे। उनकी प्राइमरी स्कूलिंग पंजाब में हुई और बाद में वे कॉलेज की पढ़ाई के लिए नैनीताल के शेरवुड कॉलेज चले गए।

उन्होंने कॉलेज की आगे की पढ़ाई अमृतसर के हिंदू कॉलेज से पूरी की। बचपन में मानेकशॉ अपने पिता की तरह ही मेडिकल फील्ड में अपना कॅरियर बनाना चाहते थे, लेकिन बाद में उनकी रुचि कम होती चली गई और सेना में शामिल हो गए। मानेकशॉ ने अपने मिलिट्री कॅरियर की शुरुआत ब्रिटिश-इंडियन आर्मी से की थी। उन्होंने चार दशक तक सेना में रहते हुए देश की सेवा की, इस दौरान पांच युद्ध भी हुए।

भारतीय सेना के आठवें सेनाध्यक्ष थे मानेकशॉ

वर्ष 1969 में सैम मानेकशॉ ने भारतीय सेना के आठवें सेनाध्यक्ष के रूप में कमान संभाली और उनके नेतृत्व में भारत ने वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में विजय प्राप्त की। उनके शानदार कॅरियर के दौरान मानेकशॉ को अनेकों सम्मान प्राप्त हुए और वर्ष 1972 में भारत सरकार ने उन्हें दूसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया। सैम मानेकशॉ का निधन 27 जून, 2008 को तमिलनाडु के नीलगिरी जिले स्थित वेलिंगटन में हुआ।

जब बेटे की जिद के आगे पिता को हार माननी पड़ी

सैम मानेकशॉ का बचपन का सपना था कि वे देश की सेवा करे, परंतु उन्हें अपने पिता के विरोध का सामना करना पड़ा। पर बेटे की जिद के आगे पिता ने हार मान ली और उन्होंने इंडियन मिलिट्री एकेडमी, देहरादून में दाखिले के लिए प्रवेश परीक्षा दी। वे वर्ष 1932 में पहले 40 कैडेट्स वाले बैच में शामिल हुए।

द्वितीय विश्वयुद्ध में 7 गोलियां लगने के बाद भी बचे

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सैम मानेकशॉ बर्मा फ्रंट पर तैनात थे और जापान के साथ युद्ध में उन्हें 7 गोलियां लगी थी, उनकी हालत बहुत खराब हो गई थी। ऐसे में उनके कमांडर मेजर जनरल कोवान ने उसी समय अपना मिलिट्री क्रॉस उतार कर उनके सीने पर लगा दिया क्योंकि मृत्यु से पहले यह सैनिक को दिया जाता था, मरणोपरांत नहीं। जब मानेकशॉ घायल थे तो आदेश दिया गया था कि सभी घायलों को उसी अवस्था में छोड़ दिया जाए, क्योंकि अगर उन्हें वापस लाया जाता तो पीछे हटती बटालियन की गति धीमी पड़ जाती, लेकिन उनका अर्दली सूबेदार शेर सिंह उन्हें अपने कंधे पर उठा कर पीछे लाया। सैम की हालत बहुत ही गंभीर थी और डॉक्टरों ने उनके इलाज में अपना समय बरबाद करना उचित नहीं समझा।

तब सूबेदार शेर सिंह ने डॉक्टरों की तरफ़ अपनी भरी हुई राइफ़ल तानते हुए कहा था, “हम अपने अफ़सर को जापानियों से लड़ते हुए अपने कंधे पर उठा कर लाए हैं। हम नहीं चाहेंगे कि वह हमारे सामने इसलिए मर जाएं क्योंकि आपने उनका इलाज नहीं किया। आप उनका इलाज करिए नहीं तो मैं आप पर गोली चला दूंगा।” डॉक्टर ने मरे मन उनके शरीर में घुसी गोलियाँ निकालीं और उनकी आंत का क्षतिग्रस्त हिस्सा काट दिया। ऐसा चमत्कार हुआ कि सैम मौत के मुंह से बच निकले और देश को एक काबिल सेनाध्यक्ष मिल सका। मानेकशॉ से जब पूछा गया कि क्या हुआ था? तो वो मज़ाक करते हुए बोले गधे ने लात मार दी थी। बाद में वर्ष 1946 में लेफ़्टिनेंट कर्नल सैम मानेकशॉ को सेना मुख्यालय दिल्ली में तैनात किया गया।

71 के युद्ध में पाक को धूल चटाने की रणनीति बनाई

बात वर्ष 1947 की है जब मानेकशॉ और याह्या ख़ान दिल्ली में सेना मुख्यालय में तैनात थे। मानेकशॉ के पास एक मोटरसाइकिल थी, जिसे याह्या ख़ान बहुत पसंद करते थे और वे इसे ख़रीदना चाहते थे, लेकिन सैम उसे बेचने के लिए तैयार नहीं थे। जब देश का विभाजन हुआ तो याह्या ख़ान ने पाकिस्तान जाने का फ़ैसला किया, उस समय सैम ने याह्या ख़ान को अपनी मोटरसाइकिल 1,000 रुपये में बेच दी। याह्या इस मोटरबाइक को पाकिस्तान ले गए और वादा कर गए कि जल्द ही पैसे भिजवा देंगे। सालों बीत जाने के बाद भी सैम के पास उस मोटरबाइक बेचने का चेक कभी नहीं आया।

बहुत सालों बाद जब पाकितान और भारत में युद्ध हुआ तो सैम मानेकशॉ और याह्या ख़ान अपने-अपने देशों की सेना के सेनाध्यक्ष थे। लड़ाई जीतने के बाद सैम ने मज़ाक किया, “मैंने याह्या खान के चेक का 24 सालों तक इंतज़ार किया, लेकिन वह कभी नहीं आया। आखिर उन्होंने वर्ष 1947 में लिया गया उधार अपना देश दे कर चुकाया।”

जब सैम के जवाब पर इंदिरा गांधी को गुस्सा आया

मानेकशॉ सच बोले से कभी डरते नहीं थे, जब वर्ष 1971 में पाकिस्तान के साथ तनाव बढ़ रहा और युद्ध के हालात थे तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने असमय पूर्वी पाकिस्तान पर हमले के लिए स्थिति को जाना, तो उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया कि इस स्थिति में हमारी हार तय है। इससे इंदिरा गांधी को गुस्सा आ गया। उनके गुस्से की परवाह किए बगैर सैम मानेकशॉ ने कहा, ‘प्रधानमंत्री, क्या आप चाहती हैं कि आपके मुंह खोलने से पहले मैं कोई बहाना बनाकर अपना इस्तीफा सौंप दूं।’

इसके बाद उन्होंने छह माह के समय में सैनिकों को युद्ध के लिए प्रशिक्षण दिया और अनुकूल समय पर पाकिस्तान पर आक्रमण किया। उनके ही नेतृत्व में भारत ने वर्ष 1971 के युद्ध में पाकिस्तान को हराया और उसके 90,000 सैनिकों को बंदी बनाया जो आज तक भी एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड है।

सेना द्वारा तख्तापलट की अफवाह पर दिया बोल्ड जवाब

इंदिरा गांधी उस समय देश की प्रधानमंत्री हुआ करती थीं, जब सेना द्वारा तख्तापलट की अफवाह फैली। इंदिरा गांधी ने इस बारे में सैम मानेकशॉ से पूछा। इस पर उन्होंने अपने बोल्ड अंदाज में ही जवाब दिया, ‘आप अपने काम पर ध्यान दो और मैं अपने काम पर ध्यान देता हूं। राजनीति में मैं उस समय तक कोई हस्तक्षेप नहीं करूंगा, जब तक कोई मेरे मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा।’

अपने सैनिकों के प्रति सैम मानेकशॉ का खास लगाव था। एक बार नया अफसर कैंट में पहुंचा, उसके पास काफी सामान भी था, जिन्हें ले जाने में उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ रहा था। ऐसे में मानेकशॉ ने उन्हें देखा तो उसकी मदद के लिए आये और सामान पहुंचाने में मदद करने लगे। नए भर्ती हुए इस अफसर ने कमांडर मानेकशॉ को नहीं पहचाना। उसने सैम से पूछा कि यहां क्या करता हूं? इस पर मानेकशॉ बोले, नए अफसरों का सामान उठाने में मदद करता हूं। अगर समय बच गया तो इन्फ्रेंटरी को कमांड भी कर लेता हूं।

Read More: भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ थे प्रसिद्ध लेखक और कवि डॉ. कैलाश वाजपेयी

COMMENT