रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ी थी आजादी के लिए लड़ाई

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Rani LaxmiBai

भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ ​बिगुल बजाने वाली वीरांगना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की 19 नवंबर को 191वीं जयंती हैं। उन्होंने मात्र 23 साल की उम्र में ही ब्रिटिश सेन से लड़ाई लड़ी और युद्ध क्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हुई, लेकिन उन्होंने अपने जीते जी झांसी राज्य पर अंग्रेजों का कब्जा नहीं होने दिया। वह अदम्य साहस, शौर्य और देशभक्ति की प्रतिमूर्ति थी।

आरंभिक जीवन

रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर, 1828 को एक मराठी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका नाम मणिकर्णिका था, लेकिन परिवार वाले प्यार वश उन्हें मनु पुकारते थे। उनके पिता मोरोपंत तांबे और माता भागीरथी सप्रे थी। जब मनु चार वर्ष की थीं तभी उनकी माता का देहांत हो गया।

उनके पिता बिठूर जिले के पेशवा के यहां नौकरी करते थे और मनु भी अपने पिता के साथ वहां जाने लगी। मनु के स्वभाव के कारण वह सबकी चहेती बन गई। वहां उन्हें ‘छबीली’ के नाम से पुकारा जाने लगा। बचपन से ही वह नाना साहेब और तांत्या टोपे के साथ युद्ध कला सीखने लगी थी।

मनु का विवाह वर्ष 1842 में झांसी नरेश गंगाधर राव निम्बालकर के साथ हुआ था। इस प्रकार वह झांसी की रानी बन गई और उनका नाम बदलकर लक्ष्मीबाई कर दिया गया। वर्ष 1851 में रानी को पुत्र रत्न हुआ। जिसका नाम राजकुंवर दामोदर राव रखा गया। परंतु यह खुशी ज्यादा दिनों नहीं रही और बालक दामोदर की चार महीने की आयु में मौत हो गई। इसके बाद उनका भाग्य रूठ गया। पुत्र की मौत से गंगाधर राव को सदमा लगा और वह अस्वस्थ होने लगे। उनकी सेहत अधिक बिगड़ने पर उन्हें उत्तराधिकारी के लिए दत्तक पुत्र लेने की सलाह दी गई। उन्होंने पुत्र गोद लिया और उकस नाम भी दामोदर राव रखा। बाद में 21 नवम्बर, 1853 को गंगाधर राव का देहांत हो गया।

झांसी राज्य को अंग्रेजों की राज्य हड़प नीति का शिकार होना पड़ा

गंगाधर को देहांत होते ही अंग्रेजी हुकूमत ने झांसी का हड़पने की चाल चली। इस समय ब्रिटिश साम्राज्य का भारत में गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी थे। उन्होंने बालक दामोदर राव को झांसी राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और ‘डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स’ नीति के तहत झांसी राज्य का विलय अंग्रेजी साम्राज्य में करने का फैसला ​किया।

इस पर रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों को विरोध किया। उन्होंने अंग्रेज वकील जॉन लैंग की सलाह ली और लंदन की कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया। बाद में यह मुकदमा खारिज कर दिया गया। इस पर अंग्रेजों ने झांसी का खजाना जब्त कर लिया और रानी लक्ष्मीबाई के पति गंगाधर राव के कर्ज को रानी के सालाना खर्च में से काटने का हुक्म दे दिया।

अंग्रेजों की साजिश से लक्ष्मीबाई को झांसी का किला छोड़ना पड़ा। 7 मार्च, 1854 को झांसी पर ​अंग्रेजों का अधिकार हो गया। लेकिन रानी ने हिम्मत नहीं हारी और झांसी को पुन: अंग्रेजों से लेना का निश्चय किया।

1857 का विद्रोह

रानी ने अंग्रेजों से मुकाबला करने के लिए एक स्वयंसेवक सेना का गठन किया। इस सेना में महिलाओं की भी भर्ती की गई। उन्हें युद्ध का प्रशिक्षण दिया गया। झांसी की जनता ने भी रानी का साथ दिया।

अंग्रेजों के खिलाफ इस संघर्ष में रानी के साथ अंग्रेजी साम्राज्य की हड़प नीति के शिकार अन्य शासक भी शामिल थे। जिनमें प्रमुख बेगम हजरत महल, अंतिम मुगल सम्राट की बेगम जीनत महल, स्वयं मुगल सम्राट बहादुर शाह, नाना साहब के वकील अजीमुल्ला शाहगढ़ के राजा, वानपुर के राजा मर्दनसिंह और तांत्या टोपे आदि।

जनवरी, 1858 में अंग्रेजी सेना ने झांसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च में शहर को घेर लिया। करीब दो हफ्ते तक संघर्ष हुआ। रानी लक्ष्मीबाई अपने पुत्र दामोदर राव के साथ अंग्रेजी सेना से बच निकली। वह काल्पी पहुंच गई और तांत्या टोपे से मिली।

अंतिम समय

तांत्या टोपे और लक्ष्मीबाई की संयुक्त सेना ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों की सहायता से एक किले पर कब्जा कर लिया। रानी लक्ष्मीबाई ने जी-जान से अंग्रेजी सेना का मुकाबला किया लेकिन 17 जून, 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में ब्रिटिश सेना से लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हो गईं।

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