जब धमकी भरी चिट्ठियों को अपने अखबार में छापना शुरू कर दिया था प्रभाष जोशी ने

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हिन्दी पत्रकारिता के आधार स्तंभों में से एक रहे संपादक प्रभाष जोशी की आज 15 जुलाई को 86वीं जयंती है। वह राजनीति और क्रिकेट पत्रकारिता के विशेषज्ञ भी थे। यह कहा जाता है कि उनके बाद पत्रकारिता से संपादक नाम की संस्था मर गई है। प्रभाष सत्ता को सीधे ललकारते थे और वह निडरता से कहते थे- मैं हिंदू हूं, लेकिन अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाने वालों को खुलेआम हिंदू धर्म का दुश्मन कहता हूं। ऐसे में इस खास मौके पर जानते हैं उनके जीवन के बारे में…

इंदौर के निकट स्थित बड़वाहा नामक स्थान पर हुआ था जन्म

प्रभाष जोशी का जन्म 15 जुलाई, 1936 को मध्य प्रदेश के इंदौर के निकट स्थित बड़वाहा नामक स्थान पर हुआ था। प्रभाष ऐसे पत्रकार थे जो बंद कमरे में रहकर लिखने वाले नहीं थे बल्कि एक सक्रिय कार्यकर्त्ता भी थे, जो गांव, शहर, जंगल की खाक छानते हुए सामाजिक विषमताओं का अध्ययन कर न केवल समाज को खबर देते थे अपितु उसे दूर करने के लिए हर संभव प्रयास करना उनकी बेमिसाल पत्रकारिता का ही एक हिस्सा था।

उन्होंने ‘नई दुनिया’ से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने कॅरियर की शुरुआत की। बाद में वह सरोकार परक पत्रकारिता के लिए मशहूर रामनाथ गोयनका के संपर्क में आए और यहीं से उनकी क्रांतिकारी लेखनी और संपादकीय हुनर की गवाह पूरी दुनिया बनी। वर्ष 1983 में ‘जनसत्ता’ समाचार पत्र की शुरुआत प्रभाष जोशी के संपादन में हुई। 80 के दशक में यह अखबार जनता की आवाज की शक्ल ले चुका था। इसके माध्यम से पंजाब में खालिस्तानी अलगाववाद और बोफोर्स घोटाले जैसे कुछ घटनाओं का प्रकाशन में उन्होंने निर्भीकता और निष्पक्षता का परिचय दिया। यह सब जोशी के विलक्षण नेतृत्व के बल पर संभव हुआ।

जोशी की मूल्य आधारित पत्रकारिता के बारे में ‘जनसत्ता’ के पूर्व स्थानीय संपादक और वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव कहते हैं, ‘मैंने प्रभाष जोशी के साथ बतौर स्थानीय संपादक काम किया। मेरा मानना है कि उन्होंने हिंदी पत्रकारिता की गरिमा को बढ़ाने और उसे एक नए शिखर पर ले जाने काम किया।’

प्रभाष जोशी ने धर्म से उपर उठकर लिखा है। उन्होंने वर्ष 1992 में अयोध्या कांड के बाद अपनी प्रतिक्रिया में एक लेख लिखा जिसमें उन्होंने लिखा- ‘अयोध्या में लंका कांड करने वालों को न तो राम का चरित मालूम है, न वे वहां राम मंदिर बनाने गए थे। राम की वानर सेना में भी उनसे ज्यादा विवेक था। गांधी को मार कर जो लोग शांत नहीं हुए, वे अयोध्या में बाबरी ढांचे को गिरा कर भी संतुष्ट नहीं होंगे।’

ऐसा लगता है जोशी ने अपने लेखों में अपने विचार नहीं रखे थे, बल्कि देश की सियासी दिशा की भविष्यवाणी करते हुए उन्होंने लिखा— ‘किसी भाजपा नेता ने कहा कि यह साल छद्म धर्मनिरपेक्षता और असली पंथ निरपेक्षता के संघर्ष का साल होगा। लेकिन अगर आप छह दिसंबर के सारे अर्थ समझ लें तो अगला साल ही नहीं आने वाले कई साल प्रतिक्रियावादी छद्म और संकीर्ण हिन्दुत्व और धर्म के संघर्ष के साल होंगे।’

अयोध्या में विवादित ढांचे के विध्वंस के बाद सात दिसंबर, 1992 को प्रभाष जोशी के लेख ‘राम की अग्नि परीक्षा’ में लिखा एक अंश… ‘राम की जय बोलने वाले धोखेबाज विध्वंसकों ने कल मर्यादा पुरुषोत्तम राम के रघुकुल की रीत पर अयोध्या में कालिख पोत दी।’

वास्तविकता तो यह थी कि इस घटना से प्रभाष जोशी बहुत व्यथित थे। उन्हें लगता था कि ये हमला सिर्फ धार्मिक ढांचे पर नहीं, बल्कि हिंदुस्तान के हजारों साल पुराने ढांचे पर हुआ है… इन लेखों के परिणामस्वरूप यह हुआ कि उग्र हिंदुत्व के पैरोकार प्रभाष जोशी के दुश्मन बन गए। उन्हें धमकियां मिलने लगीं, गालियां दी जाने लगीं… लेकिन प्रभाष तो प्रभाष थे। जवाब में उन्होंने धमकी भरी चिट्ठियों को भी अपने अखबार जनसत्ता में छापना शुरू कर दिया। जब उनके हिंदू होने पर सवाल उठने लगे तो उन्होंने एक और लेख ‘हिंदू होने का धर्म’ में लिखा-

मैं हिन्दू हूं और आत्मा के अमरत्व में विश्वास करता हूं। पुनर्जन्म और कर्मफल में भी मेरा विश्वास है। मेरा धर्म ही मुझे शक्ति देता है कि मैं अधर्म से निपट सकूं। प्रतिक्रिया और प्रतिशोध की कायर हिंसा के बल पर नहीं, अपनी आस्था, अपने विचार, अपनी अहिंसा और अपने धर्म की अक्षुण्ण शक्ति के बल पर।

सांप्रदायिक और राजनीति मुद्दों पर खुलकर बोलते-लिखते थे

प्रभाष जोशी ने न सिर्फ धर्म का मर्म बताया, संपादन से लेकर हिंदी पत्रकारिता के नए आयाम समझाए। धोती-कुर्ते में अपने पूरे अक्खड़पन लेकिन एक मीठी कोमलता के साथ जब वो टीवी शोज की राजनीतिक चर्चाओं में हिस्सा लेते थे, तो सुनने वाले किसी एक्शन थ्रीलर जैसे मोहपाश में बंध जाते थे। जिस जमाने में प्रभाष जोशी हर संडे को ‘कागद कारे’ नाम का अपना कॉलम जनसत्ता में लिखते थे, उस जमाने में पत्रकारिता और पढ़ने में रुचि रखने वाले लोगों के लिए हफ्ते के बाकी दिन सिर्फ रविवार की सुबह के इंतजार में बीतते थे।

प्रभाष जी के व्यक्तित्व में जो विविधता थी, वो भी कमाल की थी। एक तरफ तो वो सांप्रदायिक और राजनीति मुद्दों पर खुलकर बोलते-लिखते थे, दूसरी तरफ उन्हें खेल, खासकर क्रिकेट और म्यूजिक से भी उतना ही लगाव था।

प्रभाष ने क्रिकेट की रिपोर्टिंग के लिए खेल पत्रकारों को नई पिच दी। क्रिकेट की शुरुआत भले ही इंग्लैंड में हुई लेकिन आज ये खेल अंग्रेजों से ज्यादा हमारा है, तो फिर इसकी रिपोर्टिंग अपनी भाषा में क्यों नहीं। लिहाजा प्रभाष जोशी ने सबसे पहले बॉलर को गोलंदाज और तेज मारने वाले बल्लेबाज को लप्पेबाज और चौके को चव्वा कहना शुरू किया। उन्होंने क्रिकेट को लेकर एक किताब ‘खेल सिर्फ खेल नहीं’ लिखी।

सक्रिय पत्रकारिता से अलग होने के बाद जोशी ने अपनी लेखनी को विराम नहीं दिया। जीवन के आखिरी कुछ साल में उन्होंने ‘पेड न्यूज’ के खिलाफ जोरदार आवाज बुलंद की। उनके प्रयासों का नतीजा था कि पेड न्यूज के खिलाफ पहली बार एक बहस छिड़ी और भारतीय प्रेस परिषद ने इस संदर्भ में जांच कराई।

मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर के बड़े मुरीद थे प्रभाष जोशी

जोशी क्रिकेट के बड़े शौकीन और मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर के बड़े मुरीद थे। 5 नवंबर, 2009 की रात प्रभाष जोशी भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हैदराबाद में वनडे मैच देख रहे थे, जिसमें सचिन तेंदुलकर की 175 रन की पारी के बाद भी टीम इंडिया तीन रन से मैच हार गई। मैच के दौरान ही प्रभाष जोशी ने सीने में दर्द की शिकायत की, जिसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया और उनकी मौत हो गई।

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