वैज्ञानिक व सामाजिक कार्यकर्ता राजीव दीक्षित की मौत का रहस्य आज तक है बरकरार

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भारतीय वैज्ञानिक, प्रखर वक़्ता और सामाजिक कार्यकर्ता राजीव दीक्षित का जन्म 30 नवंबर, 1967 को उत्तरप्रदेश के अलीगढ़ जिले की अतरौली तहसील स्थित नाह गांव में हुआ था। इत्तेफ़ाक से वर्ष 2010 में जन्मदिन के दिन ही उनकी मौत हुईं। इस तरह राजीव दीक्षित की जयंती और पुण्यतिथि एक ही दिन आती है। ये बात अलग है कि उनकी मौत आज तक रहस्यमयी बनी हुई है। हालांकि, साल 2019 की शुरुआत में प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से राजीव दीक्षित की मौत की फ़िर से जांच को लेकर दुर्ग पुलिस को आदेश जारी किए गए। करीब 10 साल पहले भिलाई प्रवास के दौरान राजीव की संदिग्ध परिस्थितियों में माैत हो गई थी। इस ख़ास मौके पर जानिए उनके जीवन के बारे में कुछ अनसुनी बातें…

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आईआईटी कानपुर से किया था एम.टेक

पिता घनश्याम दीक्षित के घर जन्मे राजीव दीक्षित पढ़ाई के दौरान मेधावी छात्र हुआ करते थे। उन्होंने उत्तर प्रदेश के फ़िरोज़ाबाद से 12वीं कक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद राजीव ने इलाहाबाद से बी.टेक और आईआईटी कानपुर से एम.टेक की पढ़ाई की। बाद में उनकी वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद यानि सीएसआईआर में बतौर साइंटिस्ट नौकरी लग गई थी। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि जब राजीव दीक्षित सीएसआईआर में साइंटिस्ट हुआ करते थे, उस दौरान उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति और भारत रत्न डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के साथ भी काम किया था। वे फ्रांस के दूरसंचार क्षेत्र में बतौर वैज्ञानिक भी काम कर चुके थे।

साथियों और टीचर्स के साथ शुरु किया आंदोलन

राजीव दीक्षित इलाहाबाद में ही इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान अपने कुछ साथियों और शिक्षकों के साथ मिलकर ‘आज़ादी बचाओ आंदोलन’ की शुरुआत की थी। उन्होंने इस दौरान प्रण लिया था कि अब भारत को विदेशी सामान से मुक्त कराना है। राजीव ने बाद में भारतीय इतिहास, भारतीय संविधान के मुद्दों और भारतीय आर्थिक नीति के बारे में भी जागरूकता फ़ैलाने के लिए प्रयास किए। उन्होंने 5 जनवरी, 2009 को ‘भारत स्वाभिमान आंदोलन’ का गठन किया था।

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इस आंदोलन के जरिए उन्होंने देश के लोगों को विदेशी सामान को त्यागकर स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग करने के लिए प्रेरित किया। उस दौरान वे बाबा रामदेव से मिले और इस मुद्दे पर काम करने के लिए उन्हें राज़ी कर लिया। राजीव दीक्षित ने बाबा रामदेव के साथ मिलकर विदेशी कंपनियों के खिलाफ अभियान तेज कर दिया, जिससे वे मल्टीनेशनल कंपनियाें के अघोषित तौर पर निशाने में आ गए थे। विदेशी कंपनियाें के उत्पादों के उपयोग का विरोध करने के चलते उनकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान कायम हो चुकी थी। वे देश भर में घूम-घूम कर इस विषय पर अपना व्याख्यान देते थे।

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राजीव की मौत के वक़्त नीला पड़ गया था शव

भिलाई में प्रवास के वक़्त राजीव दीक्षित की 29-30 नवंबर 2010 की रात बीएसआर अपोलो अस्पताल में मौत हो गई थी। दरअसल, भिलाई में अक्षय पात्र फाउंडेशन के पास उसी दिन शाम 4 बजे से उनका व्याख्यान होना था। लेकिन अचानक राजीव की तबियत खराब हो गई और उन्हें तत्काल सेक्टर 9 अस्पताल ले जाया गया। वहां पर डॉ. शशिकांत सक्सेना ने उनका प्रारंभिक उपचार तो किया, लेकिन हृदयरोग से संबंधित बेहतर इलाज की सुविधा नहीं होने के कारण उन्हें बीएसआर अपोलो अस्पताल रेफर कर दिया था। जहां डॉ. दिलीप रत्नानी के देख-रेख में उपचार शुरू हुआ, लेकिन रात 1 से 2 बजे के बीच राजीव की मौत हो गई। उस दौरान डॉ. रत्नानी ने राजीव को गंभीर हृदयाघात होने की जानकारी प्रशासन और मीडिया को दी थी।

राजीव दीक्षित की मौत के वक़्त उनका शव नीला पड़ गया था। इसके बावजूद उनकी मौत पर तत्कालीन जिला प्रशासन ने शव को बिना पोस्टमार्टम कराए ही 1 दिसंबर 2010 को अंतिम संस्कार के लिए हवाई मार्ग से उनके गृहनगर भेज दिया था। राजीव की मौत को हार्टअटैक से होना बताया। ऐसे में हार्टअटैक से मौत बताए जाने व पोस्टमार्टम नहीं कराए जाने पर सवाल खड़े हो गए थे। जांच की दिशा में इसे गंभीर चूक माना गया।

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