फखरुद्दीन अली अहमद ने अपनी राजनीतिक समझ से कांग्रेस को किया था प्रभावित, बाद में इंदिरा ने बनाया राष्ट्रपति

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25 जून, 1975 की आधी रात को देश में इमरजेंसी लगाई गईं, जिसको याद करते ही आज भी हमारे ज़ेहन में इंदिरा गांधी का नाम आता है, लेकिन इस दौरान एक और शख्स थे जिन्होंने इमरजेंसी लगवाने में अहम भूमिका निभाई थी। उनका नाम था फखरुद्दीन अली अहमद, जो भारत के 5वें और तत्कालीन राष्ट्रपति थे। उस वक्त राष्ट्रपति पद पर आसीन रहे फखरुद्दीन अली अहमद ने ही इमरजेंसी लागू करने के लिए दस्तावेज पर दस्तखत किए थे। 13 मई को पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली की 117वीं जयंती है। इस ख़ास मौके पर जानिए उनके बारे में कुछ रोचक बातें…

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नेहरू से मिलने के बाद राजनीति में शामिल हुए

फखरुद्दीन अली अहमद का जन्म 13 मई, 1905 को पुरानी दिल्ली के हौज़ काज़ी क्षेत्र में हुआ था। उनके पिता कर्नल जलनूर अली अहमद चिकित्सा में एमडी और एक बंगाली अप्रवासी थे। वह बाद में असम में जाकर रहने लगे थे। फखरुद्दीन ने अपनी कॉलेज की पढ़ाई दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से पूरी की। स्नातक की पढ़ाई कर फखरुद्दीन इंग्लैंड चले गए, जहां से वो कानून की शिक्षा लेकर देश लौटे। इसी बीच वर्ष 1925 में वह पंडित जवाहर लाल नेहरू से इंग्लैंड में मिले और इसके बाद फखरुद्दीन ने इंडियन नेशनल कांग्रेस ज्वॉइन कर ली। यहीं से उनकी और नेहरू की गहरी दोस्ती हुई।

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देश में वकालत करने के साथ-साथ वह कांग्रेस के आंदोलनों में भी शामिल होने लगे। आजादी की लड़ाई के दौरान वर्ष 1942 में भारत छोडो अभियान के तहत वो जेल भी गए, जहां उन्होंने साढ़े तीन साल की सजा काटी। उनकी राजनीतिक समझ ने कांग्रेस को प्रभावित किया। वर्ष 1936 में वे असम प्रदेश कांग्रेस कमिटी के सदस्य बनने के बाद वर्ष 1947 से 74 तक एआईसीसी के सदस्य बने रहे। वहीं, वर्ष 1938 में गोपीनाथ बोर्डोलोई की मिनिस्ट्री में फाइनेंस, रेवेन्यु और लेबर मिनिस्टर की जिम्मेदारी भी संभाली।

जीवन में कई अहम पदों पर रहे फखरुद्दीन

आजादी के बाद फखरुद्दीन अली अहमद को 1952-1953 में राज्यसभा के लिए चुना गया, जिसके बाद वो असम सरकार के अधिवक्ता-प्रमुख भी बने। आगे चलकर 1957-1962 और 1962-1967 में असम वैधानिक असेंबली से कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ा और जीते। फखरुद्दीन आगे चलकर भारत के राष्ट्रपति भी बने।

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जेपी आंदोलन के वक्त इंदिरा गांधी ने बनाया राष्ट्रपति

गांधीवादी नेता जयप्रकाश नारायण का जेपी आंदोलन छात्रों को एकजुट करता जा रहा था और आखिरकार आंदोलन गुजरात होते हुए बिहार तक पहुंच चुका था। सरकारी करप्शन की खबरें मीडिया में परवान पर थी। देश में सरकार विरोधी माहौल के बीच इंदिरा गांधी ने अचानक वर्ष 1974 में फखरुद्दीन अली अहमद को देश का राष्ट्रपति घोषित किया। भ्रष्टाचार के मामलों से घिरी इंदिरा गांधी की 12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लोकसभा चुनाव लड़ने की योग्यता खारिज कर दी।

इंदिरा गांधी को सरकार के गिरने की संभावना पता लग गई थी। दूसरी तरफ विपक्ष के तेवर काफी गरम थे। ऐसे में इंदिरा गांधी 25 जून की आधी रात देश में इमरजेंसी लागू करने के आदेश दिए। उस दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने ही आपातकाल के आदेशों पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन दस्तखत किए थे, जिसकी आगे चलकर उन्हें खूब आलोचनाएं झेलनी पड़ीं। 11 फरवरी, 1977 को राष्ट्रपति भवन के दफ्तर में सुबह गिरने से उन्हें दिल का दौरा पड़ा, अस्पताल ले जाते समय उन्होंने आखिरी सांस ली।

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