मायावती: वो दलित नेता जिसकी राजनीति में एंट्री पर पिता ने छोड़ दिया था साथ

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देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश विधानसभा के इतिहास में अब तक सबसे ज्यादा चार बार मुख्यमंत्री और “बहन जी” के नाम से मशहूर बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती को कौन नहीं जानता है। राजनीति में मायावती को एक सख्त नेता और आयरन लेडी के तौर पर जाना जाता है। वहीं अपने तल्ख अंदाज की वजह से मायावती को राजनीतिक आलोचक ‘तानाशाह’ कहकर भी बुलाते हैं।

बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपना राजनीतिक सफर संघर्ष और कठिन रास्‍तों से तय किया है। बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के बाद भारतीय राजनीति के इतिहास में दलितों के सबसे बड़े नेता ‘मान्‍यवर’ कांशीराम द्वारा मायावती को अपना राजनीतिक वारिस घोषित करने के बाद मायावती ने अपनी राजनीतिक पारी शुरू की। 15 जनवरी को मायावती अपना 64वां जन्मदिन मना रही हैं, ऐसे में आइए जानते हैं उनके बारे में कुछ ख़ास बातें..

बचपन में IAS बनने का था सपना

15 जनवरी, 1956 को मायावती का जन्म दिल्ली के एक सरकारी कर्मचारी प्रभु दयाल और रामरती के घर हुआ। उनके जन्म के करीब 11 महीने बाद ही बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था। मां रामरती ने अनपढ़ होने के बावजूद अपने सभी बच्‍चों को पढ़ाया। कॉलेज पूरा करने के बाद मायावती ने दिल्ली के कालिंदी कॉलेज से एलएलबी किया फिर अपना बीएड पूरा किया। आईएएस बनने की ललक शुरू से ही थी जो उनको तैयारी तक भी ले गई।

वर्ष 2001 में मायावती को बनाया अपना उत्तराधिकारी

बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशी राम ने साल 2001 में मायावती को अपना उत्तराधिकारी बनाया जिसके बाद साल 2003 में अपने पहले कार्यकाल के लिए पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया। मायावती ने अपने राजनीतिक सफर की शुरूआत में कई उतार-चढ़ाव देखे जब उनके पिता राजनीति में जाने के सख्त खिलाफ थे जिसके कारण उन्हें पिता के छोड़ देने का गम भी सहना पड़ा।

जून 1995 में, जब मायावती पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने उन्हें “लोकतंत्र का चमत्कार” बताया और मजाक में कहा कि समाज के सबसे उपेक्षित वर्ग की महिला मुख्यमंत्री की गद्दी तक कैसे पहुंच गई?

स्वयं की प्रतिमा का अनावरण कर झेलनी पड़ी आलोचना

बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच मायावती को अक्सर अपनी व्यक्तिगत संपत्ति में बढ़ोतरी को लेकर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। 2004 की शुरुआत में, मायावती के खिलाफ अनुपातहीन संपत्ति (डीए) का मामला दर्ज किया गया था। डीए मामला ताज कॉरिडोर घोटाले का है। 2012 में राज्यसभा के लिए नामांकन में दाखिल हलफनामे के अनुसार, उनकी आय 1995 में 1.12 करोड़ रुपये से बढ़कर 111.64 करोड़ रुपये हो गई थी। मायावती ने दावा किया कि उन्होंने अपने समर्थकों से उपहार के रूप में धन लिया है।

2008 में मायावती ने सीएम के रूप में लखनऊ में चार नई प्रतिमाओं का अनावरण किया, जिसमें दलित नेता बीआर आंबेडकर, उनकी पत्नी रमाबाई, उनके संरक्षक कांशी राम और स्वयं की एक प्रतिमा थी।

2012 के विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी से हारने के बाद मायावती ने मार्च में पार्टी नेता के रूप में अपने पद से इस्तीफा दे दिया और उस महीने के अंत में राज्यसभा के लिए चुनी गईं। 2018 में एक नाटकीय विवाद के बाद मायावती राज्यसभा से भी इस्तीफा दे दिया था कि सहारनपुर में दलितों के खिलाफ अत्याचार पर उनको भाषण के लिए कम समय दिया गया जिससे उनकी आवाज़ को दबाया जा रहा है।

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