बाल ठाकरे: सबसे विवादित नेता जिसका तल्ख अंदाज बना था उसकी राजनीतिक पहचान

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देश का सबसे विवादित, कट्टर राजनेता, तल्ख बयानों के लिए पहचाना जाने वाला और महाराष्ट्र की राजनीति का केंद्र बिंदु कोई और नहीं सिर्फ एक ही था और वो है बाल ठाकरे, जिन्हें उनके चाहने वाले बाला साहेब कहकर बुलाते थे। अपनी बातों को कार्टूनों की शक्ल देकर हंसाने वाला यह राजनेता अपने तल्ख अंदाज के लिए पूरे देश में मशहूर था। शिवसेना पार्टी के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे ने एक कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी नेता के रूप में देश और महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाईं। 17 नवंबर को बाल ठाकरे की आठवीं पुण्यतिथि है। ऐसे में इस ख़ास मौके पर जानते हैं उनके जीवन से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें..

मुश्किल वक़्त में संजय दत्त की मदद की

— बाल ठाकरे का जन्म पुणे में 23 जनवरी, 1926 को हुआ। उनके पिता का नाम केशव सीताराम ठाकरे और माता रमाबाई केशव ठाकरे थे। बाला साहेब ठाकरे के अलावा उनके 9 भाई-बहन थे।

— मशहूर कार्टूनिस्ट आर. के. लक्ष्मण के साथ काम करने वाले कार्टूनिस्ट बाल ठाकरे मराठी भाषा में अपने संगठन शिवसेना का मुखपत्र ‘सामना’ प्रकाशित करते थे जो आज भी जारी है। राजनीति में आने से पहले कई सालों तक बाला साहेब ने फ्री प्रेस जर्नल में भी काम किया।

— ठाकरे फिल्म जगत से जुड़े नहीं होने के बाद भी करीब का रिश्ता रखते थे। अभिनेता संजय दत्त के मुश्किल भरे दिनों में उन्होंने मदद की थी। वहीं, प्रसिद्ध अभिनेता दिलीप कुमार उनके अजीज दोस्तों में से एक रहे।

धर्म के नाम पर वोट मांगने के लगे थे आरोप

— कट्टर नेता की पहचान होने के साथ बाल ठाकरे पर धर्म के नाम पर वोट मांगने के भी आरोप लगे। 28 जुलाई, 1999 को निर्वाचन आयोग ने बाल ठाकरे के वोटिंग पर बैन लगाया।

— बाला साहेब ठाकरे के पिता सामाजिक कार्यकर्ता थे जिन्होंने 1950 में संयुक्त महाराष्ट्र अभियान चलाया जिसमें वो मुंबई को भारत की राजधानी बनाने के लिए जिंदगी भर प्रयास करते रहे।

ठाकरे के अंतिम संस्कार में लाखों लोग हुए थे शामिल

— शिवसेना की स्थापना के साथ ही बाल ठाकरे ने मुंबई में रहने वाले हर मराठी को मदद करने का वादा किया। इसके अलावा उन्होंने लोगों को कई तरह से रोजगार उपलब्ध करवाए।

— साल 2012 में 17 नवंबर को बाला साहेब ठाकरे का मुंबई में निधन हो गया, जिसके बाद शिवाजी पार्क में लाखों लोग उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुए थे। उनके निधन पर पहली बार मुंबई के लोगों ने अपनी मर्जी से बंद रखा।

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