एनी बेसेंट ने शोषित और गरीब लोगों की दशा सुधारने के लिए जीवनपर्यंत किया काम

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भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में अहम योगदान देने वाली व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष श्रीम​ती एनी बेसेंट की 20 सितंबर को 88वीं पुण्यतिथि है। आयरिश मूल की एनी थियोसोफिस्ट, समाज सुधारक, महिला कार्यकर्ता, लेखिका और प्रवक्ता थीं। वह मानव की स्वतंत्रता की प्रबल समर्थक थी। उन्होंने भारत में आयरलैंड की तरह स्व-शासन की मांग ब्रिटिश हुकूमत से की। वह स्वतंत्रता आंदोलन में भारतीयों के अधिकारों के लिए लड़ीं। एनी एक प्रखर लेखिका भी थी, जिसने तीन सौ से अधिक पुस्तक और कई पैम्फलेट लिखे थे। उन्हें भारत में शिक्षा के प्रसार के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना में योगदान के लिए भी याद किया जाता है। ऐसे में इस ख़ास मौके पर जानते हैं उनके जीवन के बारे में कुछ अनुसनी बातें…

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एनी बेसेंट का जीवन परिचय

एनी वुड बेसेंट का जन्म 1 अक्टूबर, 1847 को ब्रिटेन के लंदन में एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता विलियम वुड और माता एमिली मॉरिस थे। जब वह महज पांच साल की थी, तक उनके पिता का देहांत हो गया था। उनकी माता ने उनके पालन-पोषण के लिए हैरो में लड़कों का एक हॉस्टल खोला। एनी के मन में बचपन से ही लोगों की सेवा की भावना जाग्रत हो चुकी थी। उनका विवाह वर्ष 1867 में पादरी फ्रैंक बेसेंट से हुआ था। उनके दो बच्चे भी हुए, लेकिन एनी के नास्तिक होने के कारण वर्ष 1873 में दोनों ने तलाक ले लिया।

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धार्मिक रूढ़ियों का खुलकर किया विरोध

समाज सुधारक एनी बेसेंट का स्वभाव विद्रोही था, जो धर्म में प्रचलित रूढ़ियों के प्रति विरोध में झलकता था। उनमें धर्म के प्रति आस्था खत्म हो गई और धार्मिक रूढ़ियों पर खुलकर विरोध करने लगी। इससे उनको लोगों का विरोध भी सहना पड़ा, लेकिन वो अपनी सोच पर दृढ़ रहीं। उन्होंने शोषित और गरीब लोगों की दशा सुधारने के लिए लंदन में श्रमिक संगठन की स्थापना की।

वह एक रचनात्मक लेखिका और प्रभावशाली वक्ता थीं। बाद में एनी बेसेंट थियोसोफिकल सोसायटी से जुड़ गई और उनकी अध्यक्ष मैडम ब्लावत्स्की बहुत प्रभावित हुई। इसके बाद उन्होंने वर्ष 1890 में फैंबियन सोसायटी और मार्क्सवाद से संबंध तोड़ लिया। ब्लावत्स्की की मृत्यु के बाद एनी इस सोयायटी की अध्यक्ष चुनी गई और जीवनपर्यंत उस पद पर बनी रही।

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ब्रह्म विचारों का प्रचार-प्रसार करने के लिए आई थी भारत

एनी बेसेंट थियोसोफिकल सोसायटी के विचारों का प्रचार-प्रसार करने के लिए पहली बार वर्ष 1893 में भारत आईं। एनी को भारतीय संस्कृति, लोग और परंपराओं ने काफी प्रभावित किया। वह इतनी प्रभावित हुई कि उन्होंने भारतीय लोगों को स्वतंत्रता और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करना शुरू कर दिया। इस दौरान वह बनारस में रहने लगी और शिक्षा के प्रसार के लिए वर्ष 1898 में सेंट्रल हिंदू स्कूल की स्थापना की। बाद में पंडित मदन मोहन मालवीय के प्रयासों से यह कॉलेज आज ‘बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय’ के रूप में जाना जाता है। एनी वर्ष 1907 में थियोसोफिकल सोसाइटी की अध्यक्ष बनी, जिसका अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय तब तक अड्यार, मद्रास में स्थापित हो गया था।

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होमरूल लीग की स्थापना कर स्व-शासन की मांग की

बेसेंट ने भारतीय आजादी के लिए लोगों में जागृति लाने के लिए अपने विचारों का प्रचार किया था। उन्होंने ‘कॉमनविल’ और ‘न्यू इंडिया’ नामक पत्रों का प्रकाशन शुरू किया। एनी बेसेंट ने अपने लेखों और भाषणों से भारत की आजादी के पक्ष में जोरदार आंदोलन किया। वर्ष 1914 में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्य बनीं। वर्ष 1916 में उन्होंने होमरूल लीग की स्थापना की और स्व-शासन की मांग की। इस आंदोलन में पंडित जवाहरलाल नेहरू भी शामिल हो गए।

बेसेंट के द्वारा ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारतीयों में स्व-शासन की मांग का प्रचार करने से घबराकर मद्रास के गर्वनर ने उन्हें भारत छोडकर चले जाने के लिए कहा। उन्होंने इंकार कर दिया तो उन्हें उनके सहयोगियों के साथ नजरबंद कर दिया गया था। इसके खिलाफ देश में व्यापक विरोध हुआ, जिसके बाद उन्हें रिहा करना पड़ा। एनी वर्ष 1917 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गईं, जो पहली महिला अध्यक्ष थीं। इस समय तक कांग्रेस का आन्दोलन मुख्यत: प्रस्तावों और मांगो तक सीमित था।

बाद में जब गांधीजी द्वारा असहयोग और सत्याग्रह आंदोलनों के माध्यम से भारतीयों में जन जागृति लाई गई तो एनी बीसेंट ने खुद को कांग्रेस से अलग कर लिया। उन्होंने अपना बाकी जीवन भारत में शिक्षा और थियोसोफी के प्रचार में लगाया। एनी बेसेंट ने देश में स्काउट आंदोलन शुरू किया और महिला संगठन की नींव रखीं।

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चेन्नई के अड्यार में हुआ निधन

आयरिश मूल की एनी बेसेंट ने अपना सारा जीवन भारत में शिक्षा के प्रचार और स्वतंत्रता आंदोलन के लिए लगा दिया। इस महान सुधारक महिला का 20 सितम्बर, 1933 को तमिलनाडु के अड्यार में देहांत हो गया।

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