मशहूर खलनायक अमरीश पुरी सौ रुपये लेकर एक्टर बनने आए थे मुंबई, पहले स्क्रीन टेस्ट रहे फेल

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Amrish-Puri-Biography

अमरीश पुरी… एक ऐसा नाम जब पीछे मुड़कर देखो तो ऐसा लगता है ये शख्स अपने समय में लगभग हर फिल्म में हुआ करता था। सिर्फ होता नहीं था, हर किरदार आपको याद है। अमरीश साहब के नाम ऐसी कई ब्लॉक-बस्टर फिल्में दर्ज हैं, अगर वो ना होते तो शायद उन फिल्मों को हम याद तक न रख पाते। 22 जून को अमरीश पुरी की 90वीं बर्थ एनिवर्सरी है। इस ख़ास मौके पर जानिए उनके जीवन के बारे में कुछ अनसुनी बातें…

“जा सिमरन जा जी ले अपनी जिंदगी”

इस डायलॉग के बिना पूरी फिल्म ही अधूरी सी लगती है। अगर अमरीश पुरी साहब नहीं होते तो ‘दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे’ इतनी बड़ी हिट कैसे हो पाती भला? वो ना होते तो शायद उस फिल्म को भी बाकी फिल्मों जैसा समझा जाता, ठंडे बस्ते में। अगर बाऊजी का किरदार शाहरूख खान को लाफा ना मारता तो सोचिए आज ‘दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे’ कहां होती?

“मौगेम्बो खुश हुआ”

जब उन दिनों सुपरहिट रही मूवी “मिस्टर इंडिया” के बारे में सोचते भी हैं तो सबसे पहले दिमाग में क्या आता है? मौगेम्बो ही आता होगा और साथ ही उस किरदार का बेहतरीन डायलॉग जिन्हें आज भी याद किया जाता है।

अमरीश पुरी का जन्म 22 जून, 1932 को पंजाब के जालंधर के पास नवांशहर जिले में हुआ था। उनके माता-पिता लाला निहाल चंद और वेद कौर थे। उनके चार भाई-बहन थे। बड़े भाई चमन पुरी और मदन पुरी बड़ी बहन चंद्रकांता और एक छोटा भाई हरीश पुरी। उन्होंने शिमला में बीएम कॉलेज से ग्रेजुएशन किया था। जेब में सौ से भी कम रूपए लेकर और जहन में इंडस्ट्री का सपना लिए वे मुंबई आए थे। उन्होंने 5 जनवरी 1957 को उर्मिला दिवेकर से शादी की। अमरीश पुरी का एक बेटा राजीव पुरी और बेटी नम्रता पुरी है।

जब अमरीश मुम्बई पहुंचे तब तक उनके भाई मदन पुरी पहले से ही एक अभिनेता बन चुके थे जो फिल्मों में नेगेटिव रोल के लिए जाने जाते थे। अमरीश पुरी को अपने पहले स्क्रीन टेस्ट में रिजेक्ट कर दिया गया था। जिसके बाद उन्हें मिनिस्ट्री ऑफ लेबर में जॉब ढूंढनी पड़ी। इस बीच उन्होंने पृथ्वी थिएटर में सत्यदेव दुबे के लिखे नाटकों में एक्टिंग करनी शुरू की जिसके बाद वे बतौर थिएटर आर्टिस्ट फेमस हुए।

उन्होंने 1979 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार जीता। अमरीश पुरी ने हिंदी, अंग्रेजी, पंजाबी, तेलुगु और तमिल फिल्मों में काम किया। 1970 में वह अपनी पहली फिल्म, प्रेम पुजारी में दिखाई दिए। इसके बाद श्याम बेनेगल की ‘निशांत’, ‘मंथन’ और ‘भूमिका’ जैसी कई आर्ट फिल्मों में नेगेटिव या सपोर्टिंग रोल में नज़र आए।

नायक का मुख्यमंत्री तो याद ही होगा। जो इटेंस किरदार उन्होंने निभाया किसी और की जगह वहां पर कल्पना तक नहीं की जा सकती। ऐसे बहुत कम ही किरदार हैं, जहां अमरीश पूरी साहब ने अपना पूरा एफर्ट ना फेंका हो।

भारतीय सिनेमा में अमरीश पुरी ने अपना लगभग पूरा जीवन लगा दिया। क्लासिक से लेकर मैन स्ट्रीम सिनेमा तक हर तरह की फील्ड में अमरीश पुरी ने अपनी छाप छोड़ी है फिर भी कभी अमरीश को बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड नहीं मिल सका। इक्के दुक्के सपोर्टिंग एक्टर के अवॉर्ड जरूर मिले हैं। उन्हें कभी भी किसी बड़े सिनेमा अवॉर्ड से नहीं नवाजा गया। 22 जून को ही उनका जन्म हुआ था।

अमरीश पूरी इंडस्ट्री के सबसे महंगे विलेन माने जाते थे। एक मूवी के लिए वे काफी मोटी रकम वसूलते थे। अमरीश कभी भी ऑडियो और वीडियो इंटरव्यू देते ही नहीं थे। मीडिया से वे दूरी ही बनाए रखते थे। अमरीश पुरी ने स्टीवन स्पीलबर्ग के साथ 1984 के ‘इंडियाना जोन्स’ और ‘टेंपल ऑफ़ डूम’ में भी काम किया। रिचर्ड एटनबरो की गांधी में भी उनका किरदार था।

अमरीश पुरी को याद करने के लिए उनके बर्थडे या उनकी डेथ एनिवर्सरी की जरूरत नहीं है। बस, टीवी चला लेना और चैनल घुमा लेना, अमरीश पुरी किसी ना किसी फिल्म में नज़र आ ही जाएंगे। 12 जनवरी 2005 को अमरीश साहब इस दुनिया से चले गए। अमरीश पुरी के करीबी बताते हैं उन्हें शराब सिगरेट जैसा किसी भी तरह का ऐब नहीं था। रोज कसरत भी किया करते थे।

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