यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त: ‘देशप्रिय’ के नाम से प्रसिद्ध स्वंतत्रता सेनानी, जो कलकत्ता के मेयर चुने गए थे

Views : 1102  |  4 minute read
Yatindra Mohan Sengupt

भारतीय स्वतंत्रता सेनानी जतीन्द्र (यतीन्द्र) मोहन सेनगुप्त की 22 फरवरी को 135वीं जयंती हैं। उन्होंने देश को ब्रिटिश हुकूमत से आजादी दिलाने के लिए स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था। वह आंदोलन के दौरान कई बार जेल भी गए। वह ‘देशप्रिय’ के नाम से भी प्रसिद्ध थे।

जीवन परिचय

जतीन्द्र मोहन का जन्म 22 फरवरी, 1885 को ब्रिटिश भारत के चंटगांव (अब बांग्लादेश) जिले के बारामा में हुआ था। वह एक जमींदार परिवार से थे। उनके पिता जात्रा मोहन सेनगुप्त वकील और बंगाल विधान परिषद के सदस्य थे।

उनकी शिक्षा कलकत्ता में प्रेसीडेंसी कॉलेज में हुई। बाद में यतीन्द्र उच्च शिक्षा के लिए वर्ष 1904 इंग्लैंड चले गए। जहां उन्होंने कैंब्रिज के डाउनिंग कॉलेज से वर्ष 1905 में कानून की डिग्री हासिल की। इंग्लैंड में प्रवास के दौरान उनकी मुलाकात अंग्रेज युवती एडिथ एलेन ग्रे से हुई। बाद में दोनों ने शादी कर ​ली। ​एडिथ बाद में नेली सेनगुप्त के नाम से प्रसिद्ध हुई। उन्होंने देश की आजादी के लिए अपने पति केे साथ कई बार जेल गई।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान

यतीन्द्र मोहन ने बैरिस्टरी करने के बाद उन्होंने कोलकाता उच्च न्यायालय में वकालत शुरू की। वह रिपन लॉ कॉलेज में अध्यापक भी रहे। वर्ष 1911 में उन्होंने बंगाल के प्रांतीय सम्मेलन में चटगांव का प्र​तिनिधित्व किया। यही से उनका राजनीतिक कॅरियर भी शुरू हुआ। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए। उन्होंने यूनियन बनाने के लिए बर्मा ऑयल कंपनी के कर्मचारियों को भी संगठित किया।

लेकिन जल्द ही देश के स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। वर्ष 1921 में उन्होंने गांधीजी द्वारा संचालित असहयोग आंदोलन में भाग लिया और वकालत छोड़ दी। वह मजदूर हित समर्थक थे तथा असम-बंगाल रेलवे की हड़ताल का संयोजन किया। इसके बाद वे बंगाल प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने तथा सविनय अवज्ञा आन्दोलन में भी उन्होंने सक्रिय नेतृत्व किया।

कलकत्ता के महापौर चुने

यतीन्द्र मोहन वर्ष 1923 में बंगाल विधान परिषद के सदस्य चुने गए। वर्ष 1925 में चित्तरंजन दास की मृत्यु के बाद उनको बंगाल स्वराज पार्टी का अध्यक्ष चुना गया। यतीन्द्र 10 अप्रैल, 1929 से 29 अप्रैल, 1930 तक कलकत्ता के महापौर चुने गए थे।

मार्च, 1930 में रंगून में एक सार्वजनिक बैठक में उन्हें सरकार के खिलाफ लोगों को भड़काने और भारत-बर्मा अलगाव का विरोध करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। वह वर्ष 1931 में प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए इंग्लैण्ड गए थे।

Yatindra Mohan Sengupta

बाद में उन्हें जनवरी, 1932 में गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें पूना, दार्जिलिंग व रांची में कैद रखा गया। उन्होंने जीवनभर राष्ट्रीय स्वाधीनता के लिए संघर्ष किया। वह ‘देशप्रिय’ उपनाम से विख्यात हैं।

निधन

उन्हें बाद में रांची की जेल में भेज दिया गया, जहां उनका स्वस्थ खराब रहने लगा। यहीं पर 23 जुलाई, 1933 को उनका निधन हो गया। भारत सरकार ने वर्ष 1985 में यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त और उनकी पत्नी नेली की स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया था।

COMMENT