ठाकुर रोशन सिंह: काकोरी कांड में शामिल नहीं होने के बाद भी दी गई फांसी

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भारत के क्रांतिकारी शहीद ठाकुर रोशन सिंह की 22 जनवरी को 128वीं जयंती है। उन्होंने देश के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। वह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य थे। हालांकि वह काकोरी षड्यंत्र में शामिल नहीं थे फिर भी उन्हें गिरफ्तार किया गया। उन्हें राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ और अशफाकुल्लाह खान के साथ फांसी दी गई।

जीवन परिचय

रोशन सिंह का जन्म 22 जनवरी, 1892 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के नबादा गांव में हुआ था। उनके पिता ठाकुर जंगी सिंह और माता कौशल्या देवी थे। उनका परिवार आर्य समाज से काफी प्रभावित था।

जब देश में गांधीजी के नेतृत्व में ‘असहयोग आन्दोलन’ किया जा रहा था तब रोशन सिंह ने अपने इलाके में आंदोलन में बढ़ चढ़कर भाग लिया।

सटीक निशानेबाज थे रोशन सिंह

रोशन सिंह शार्प शूटर और बहुत अच्छे रेसलर थे। उनकी मुलाकात वर्ष 1922 में क्रांतिकारी बिस्मिल से हुई। क्योंकि बिस्मिल को एक शॉर्प शूटर की तलाश थी, इस कारण से उन्हें वर्ष 1924 में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन में शामिल किया गया।

उनके संगठन में रोशन सिंह ने युवाओं को शूटिंग सिखाने का काम करने लगे।

काकोरी कांड में शामिल नहीं थे ठाकुर रोशन सिंह

क्रांतिकारियों ने धन की कमी को पूरा करने के लिए 9 अगस्त, 1925 को काकोरी नामक स्थान पर ट्रेन से सरकारी खाजना लूटने की योजना बनाई। इस योजना में अशफाक उल्लाह खां, रामप्रसाद बिस्मिल, चन्द्रशेखर आज़ाद, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह, सचिन्द्र बख्शी, केशव चक्रवर्ती, बनवारी लाल, मुकुन्द लाल और मन्मथ लाल गुप्त आदि क्रांतिकारी शामिल थे। उन्होंने ट्रेन से सरकारी खजाना लूटा, जिसके बाद इस घटना को काकोरी कांड से जाना जाता है।

सरकारी खजाने की लूट की खबर सुनकर ​अंग्रेजी सरकार बौखला गई और क्रांतिकारियों की पकड़ शुरू कर दी। हालांकि रोशन सिंह इस लूट में शामिल नहीं थे, फिर भी शक के कारण उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया और फांसी सुनाई गई।

फांसी

उन्हें इलाहाबाद की नैनी स्थित ‘मलाका’ जेल में रखा गया। रोशन सिंह को आठ महीने तक बड़ा कष्टप्रद जीवन बिताना पड़ा। उन्हें 19 दिसम्बर, 1927 को फांसी दी गई। उनके अंतिम दर्शन करने के लिए हजारों की तादाद में लोग एकत्रित हुए।

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