विशेष: जब-जब डॉ. राममनोहर लोहिया बोलते थे, दिल्ली का तख्ता डोलता था

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उत्तर भारत की राजनीति में डॉ. राम मनोहर लोहिया का विशेष स्थान रहा है। डॉ. लोहिया ने सिर्फ चार साल में भारतीय संसद को अपने मौलिक राजनीतिक विचारों से झकझोर पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया था। लोहिया साहब इतने जोशीले नेता थे कि उनके योगदान को इतिहास में कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज डॉ. राममनोहर लोहिया की 53वीं पुण्यतिथि है। उनका निधन 12 अक्टूबर, 1967 को हुआ था। इस ख़ास मौके पर हम आपको उनसे जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें बताने जा रहे हैं..

अपने बयानों को लेकर चर्चा में रहे राम मनोहर लोहिया

डॉ. राममनोहर लोहिया ने देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को प्रतिदिन 25 हज़ार रुपये खर्च करने वाला बताया था। उन्होंने इंदिरा गांधी को ‘गूंगी गुड़िया’ कहने का साहस किया था। उस जमाने में उनका कहना था कि महिलाओं को सती-सीता नहीं होना चाहिए, द्रौपदी बनना चाहिए। लोहिया ऐसे पहले राजनेता रहे, जिन्होंने कांग्रेस सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान करते हुए कहा था जिंदा कौमें पांच साल तक इंतज़ार नहीं करतीं। उत्तर भारत में आज भी आप राजनीतिक रुझान रखने वाले किसी युवा से बात करें तो वो इस नारे का जिक्र ज़रूर करेगा- ‘जब जब लोहिया बोलता है, दिल्ली का तख़्ता डोलता है।’

पंडित जवाहर लाल नेहरू का जमकर किया था विरोध

जब देश जवाहर लाल नेहरू को अपना सबसे बड़ा नेता मान रहा था, ये राममनोहर लोहिया ही थे जिन्होंने नेहरू को सवालों से घेरना शुरू किया था। नेहरू से उनकी तल्खी का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उन्होंने एक बार ये भी कहा था कि बीमार देश के बीमार प्रधानमंत्री को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए।

गोवा को आज़ाद कराने में डॉ. लोहिया का रहा अहम योगदान

गोवा में 1961 तक पुर्तग़ालियों का ही शासन था। गोवा में राष्ट्रवाद की शुरुआत तो ‘गोवा कांग्रेस समिति’ के अध्यक्ष डॉ. टी. बी. कुन्हा ने की, लेकिन इसकी स्वतंत्रता की असल नींव प्रमुख भारतीय समाजवादी डॉ. राम मनोहर लोहिया ने रखी। गोवा की आजादी में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका स्वतंत्रता सेनानी राममनोहर लोहिया की ही थी, क्योंकि उन्होंने ही लोगों में आजादी के प्रति जोश भरा और पुर्तगालियों के विरूद्ध एकजुट होने के लिए लोगों का नेतृत्व किया। उन्होंने नागरिक अधिकारों के हनन के विरोध में सभा करने की चेतावनी दी, जिसके चलते उन्हें जेल भी जाना पड़ा, लेकिन उनके नेतृत्व में लोगों में आजादी के प्रति जोश जाग उठा और विरोध तेज होने लगा था।

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