स्पेशल: नेत्रहीन होने के बावजूद हिंदी सिनेमा में बड़ा मुक़ाम हासिल करने वाली शख्सियत थे रविन्द्र जैन

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हिंदी फिल्मों के प्रसिद्ध संगीतकार एवं गीतकार रविन्द्र जैन की 9 अक्टूबर को चौथी पुण्यतिथि है। संगीत की दुनिया में कुछ कर दिखाने के लिए साल 1969 में ‘सपनों की नगरी’ आए रविन्द्र का निधन 71 साल की उम्र में वर्ष 2015 को मुंबई के लीलावती अस्पताल में हुआ था। आंखों में रोशनी नहीं होने के बावजूद इस महान संगीतकार ने अपने मधुरम संगीत से दुनिया को रोशन करने वाले अपने कर्णप्रिय संगीत से सजाया। संगीत के क्षेत्र में बड़ा मुक़ाम हासिल करने वाले रविन्द्र जैन को साल 2015 में भारत सरकार ने ‘पद्मश्री’ सम्मान से नवाज़ा था। अपनी कला के हुनर के कारण उन्हें जीवनभर लोगों का खूब प्यार मिला। ऐसे में इस महान शख्सियत की डेथ एनिवर्सरी के अवसर पर जानते हैं उनके बारे में कई दिलचस्प बातें..

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4 साल की उम्र से ही सीखने लगे थे संगीत

रविन्द्र जैन का जन्म 28 फ़रवरी, 1944 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुआ था। वे अपने 7 भाई-बहनों में तीसरे नंबर के थे। उनकी पढ़ाई अलीगढ़ विश्वविद्यालय के ब्लाइंड स्कूल में हुई थी। रविन्द्र ने 4 साल की उम्र से ही उन्होंने संगीत की तालीम लेनी शुरू कर दी थी। इसके ​अलावा वे बचपन में जैन भजन और जैन कवियों की कविताएं पढ़ते थे। अलीगढ़ में पढ़ाई पूरी करने के बाद रविन्द्र संगीत के शिक्षक बनकर कोलकाता पहुंचे। उनकी आंखो में बचपन से रोशनी नहीं थी, लेकिन उन्होंने अपने संगीत से जग रोशन कर दिया। रविन्द्र जैन ने अपने जादुई, सुरमयी संगीत और खनकती आवाज़ के दम पर आम लोगों के दिलों में जगह बनाईं।

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1969 में कलकत्ता से मुंबई पहुंचे थे रविन्द्र

मुंबई आने से पहले रविन्द्र जैन की कलकत्ता में फिल्मी संगीत की दुनिया में एंट्री हो चुकी थीं। साल 1969 में रविन्द्र की कलकत्ता से मुंबई शिफ्ट हो चुके थे। सबसे पहले उन्हें फिल्म ‘सौदागर’ के संगीत के लिए सुधेंदु राय ने साइन किया। इस फिल्म के लिए उन्होंने अद्भुत संगीत तैयार किया। फिल्म के गाने ‘सजना है मुझे सजना के लिए’, ‘हर हसीं चीज का मै तलबगार हूं’ और ‘तेरा मेरा साथ रहे जैसे’ गाने बड़े हिट साबित हुए। दिलचस्प बात ये है कि इस फिल्म के संगीत को तैयार करने के दौरान रविन्द्र जैन के पिता का निधन हो गया था। लेकिन जब उन्हें ये खबर मिली तो वे संगीत निर्देशन के काम में उलझे हुए थे। ये उनका काम के प्रति समर्पण ही था कि पूरा करने के बाद वे अपने घर गए। दक्षिण भारतीय गायक येसुदास को हिंदी फिल्मों में लाने का श्रेय रविन्द्र को ही दिया जाता है।

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कई कई हिट फिल्मों में दिखाया संगीत का जादू

70 के दशक में रविन्द्र जैन ने कई हिट फिल्मों में संगीत दिया। इन फिल्मों में उनका संगीत लोगों खूब पसंद आया और उन्हें पहचान भी दिलाई। उन्होंने इस दौरान फिल्म ‘चोर मचाए शोर’, ‘गीत गाता चल’, ‘चितचोर’, ‘अंखियों के झरोखे से’, ‘हीना’ और ‘राम तेरी गंगा मैली’ जैसी फिल्मों में संगीत का जादू दिखाया। इसी दौर में राजश्री प्रोडक्शन जैसी बड़ी कंपनी के साथ उनका जुड़ाव रहा। रविन्द्र जैन का बर्मन दादा के प्रति लगाव इस कदर था कि उनकी शुरुआती फिल्मों के संगीत में बर्मन दादा के संगीत की छाप मिलती है। इस बात को खुद रविन्द्र भी मानते भी थे।

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फिल्म ‘चितचोर’ में रविन्द्र जैन एक्टर अमोल पालेकर के लिए एक नई आवाज चाहते थे। उन्होंने येसुदास को सुना। उन्हें लगा कि हिंदुस्तान की नई आवाज मिल गई है। रविन्द्र ने उनकी आवाज इस फिल्म के डायरेक्टर बासु चटर्जी को सुनाई। येसुदास की आवाज़ सभी को खूब पसंद आई। इस फिल्म में उनकी आवाज़ में और रविन्द्र के संगीत में ‘जब दीप जले आना’ और ‘गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा’ जैसे खूबसूरत रिकॉर्ड हुए।

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ख़ास बात ये भी है कि इस फिल्म के गीत भी रविन्द्र जैन ने ही लिखे थे। 80 के दशक में रविन्द्र जैन को पहली बार फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। फिल्मों के अलावा रविन्द्र ने अपने करीब चार दशक के कॅरियर में दादा-दादी की कहानियां, रामायण और लव-कुश जैसे मशहूर कार्यक्रमों को भी अपने संगीत से कर्णप्रिय बना दिया था।

 

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