राहुल गांधी ने “पप्पू” के टैग को तो हटा लिया, लेकिन क्या प्रधानमंत्री बन सकते हैं?

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कई लोगों को राहुल गांधी की काबलियत पर शंका थी जब वे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किए गए थे। खुद पार्टी के लोगों को ऐसा लगता था कि वे अध्यक्ष पद के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं हैं। कई लोगों को ऐसा लगता था कि राहुल गांधी जनता के साथ कनेक्शन नहीं बना पाते। भाषण की जहां बात आती है वहां भी राहुल गांधी को कम आंका जाता था।

लेकिन कुछ हद तक आज एक साल बाद कई चीजें बदली हैं। राहुल गांधी में एक कोन्फिडेंस देखने को मिल रहा है। वे ज्यादा उत्साह और जोश के साथ जनता से बातचीत करते नजर आते हैं।

लेकिन लोग राहुल गांधी को एक सीरीयस नेता के रूप में लें और उन्हें हल्के में न लें इसके लिए राहुल गांधी को एक लंबा रास्ता तय करना है।

राहुल गांधी के प्रदर्शन की बात करें तो 2017 में गुजरात चुनावों में उन्होंने अपनी साख पाई। गुजरात में बीजेपी को कड़ी टक्कर देने के साथ कर्नाटक में बीजेपी से आगे निकलते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने खुद को साबित करने की कोशिश की। अब विधानसभा चुनावों की अगर हम बात करें तो एग्जिट पोल में कांग्रेस आगे चल रही है। रिजल्ट जो भी हो अगर कांग्रेस सभी विधानसभा क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन करती है तो राहुल गांधी की छवि को काफी बूस्ट मिलेगा।

लेकिन ये बूस्ट नारे “अगला प्रधानमंत्री राहुल गांधी” तक शायद ना पहुंचे। कई कांग्रेस नेता भी खुद मानते हैं कि राहुल गांधी में काफी सुधार देखने को मिला है लेकिन फिर भी उनकी छवि प्रधानमंत्री तक कहीं ना कहीं नहीं पहुंचती। इस पर वो बात याद आती है जब संसद में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी को गले से लगा लिया और फिर अपनी सीट पर आकर आंख मारी। कांग्रेस लीडर्स का मानना था कि राहुल गांधी ने एक युवा कांग्रेस नेता जैसा व्यवहार किया। जिससे पता चलता है कि राहुल गांधी नरेन्द्र मोदी को टक्कर देने में अभी भी पीछे हैं।

कई लोगों का मानना है कि राहुल गांधी ने अपनी छवि को काफी हद तक सुधारा है। अध्यक्ष पद पर रहते हुए राहुल गांधी में कई तरह का सुधार सामने आया है। बीजेपी पार्टी ने राहुल गांधी पर जो ‘पप्पू’ का टैग लगाया था वो कहीं ना कहीं उन्होंने दूर कर लिया है। लोगों का कहना है कि अब वे सभाओं में जनता को आकर्षित करने लगे हैं वो उत्साह उनकी स्पीच में देखने को मिल रहा है। राहुल गांधी ने अपनी पार्टी में यूथ और अनुभवी लोगों को शामिल कर एक बेलेंस बना रखा है।

यह समझते हुए कि वह पार्टी के दिग्गज नेताओं को त्यागा नहीं। गांधी ने अनुभव और युवाओं का मिश्रण सुनिश्चित किया है। अहमद पटेल, मोतीलाल वोरा, अशोक गहलोत, कमलनाथ, मल्लिकार्जुन खड़गे, गुलाम नबी आजाद और अंबिका सोनी जैसे सीनियर पार्टी के नेताओं को भारी कार्य सौंपा गया है। साथ ही, युवा चेहरों को भी शामिल किया गया है। दीपक बाबरिया, अविनाश पांडे, केसी वेणुगोपाल, आरपीएन सिंह और राजीव सातव जैसे नाम इसमें शामिल हैं।

कई कांग्रेस नेताओं का यह भी मानना है कि राहुल गांधी पार्टी को बौद्धिक नेतृत्व या वैचारिक स्पष्टता प्रदान करने में नाकाम रहे हैं। मोदी पर हमला करना काफी नहीं है।

कई लोगों का यह भी मानना है कि राहुल गांधी नेहरू के सेकुलर नक्शे कदम पर कहीं ना कहीं सॉफ्ट हिन्दुत्व की ओर बढ़ रहे हैं। पब्लिक में मंदिरों में जाना और धर्म पर बात करना कहीं ना कहीं कांग्रेस के बदलते एजेंडे को दिखाता है। जिस भी विधानसभा में चुनाव होते हैं राहुल गांधी मंदिरों में जरूर जाते हैं और खुद को जनेऊधारी ब्राह्मण बताते हैं।

लेकिन पार्टी नेताओं का कहना है कि राहुल गांधी मंदिरों में एक अलग तरीके से जाते हैं। वक्त बदल गया है बीजेपी ने यह माहौल तैयार कर दिया है कि कांग्रेस सिर्फ अल्पसंख्यकों के हितों के लिए काम करती है। इसलिए राहुल गांधी पार्टी के माध्यम से यह संदेश देना चाहते हैं कि पार्टी सभी धर्मों के लिए है।

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