रघुवीर सहाय: ऐसा कवि जिनकी कविताएं आजादी की लड़ाई के सपनों की याद दिलाती हैं

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हिंदी साहित्य के कवि, लघु-कथा लेखक, निबंधकार, आलोचक, अनुवादक और पत्रकार रघुवीर सहाय की 30 दिसंबर को 29वीं पुण्यतिथि हैं। वह हिंदी की नई कविता के कवि हैं। रघुवीर सहाय को साहित्यिक रचना ‘लोग भूल गए हैं’ के लिए उन्हें वर्ष 1984 के साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वह वर्ष 1969 से 1982 तक राजनीतिक—सामाजिक हिंदी साप्ताहिक ‘दिनमान’ मुख्य संपादक रहे थे।

जीवन परिचय

रघुवीर सहाय का जन्म 9 दिसंबर, 1929 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ में हुआ था। उनकी आरंभिक शिक्षा से लेकर कॉलेज तक की शिक्षा लखनऊ में ही संपन्न हुई। उन्होंने वर्ष 1951 में अंग्रेजी साहित्य में मास्टर की डिग्री प्राप्त की।

उन्होंने अपना कॅरियर एक पत्रकार के रूप में शुरु किया ​था। वर्ष 1949 में उन्होंने दैनिक जनजीवन में कार्य किया। बाद में वर्ष 1951 में दिल्ली आए और ‘प्रतीक’ पत्रिका में सहायक संपादक के रूप में कार्य किया। वह आकाशवाणी के समाचार विभाग में उपसंपादक बन गए। उन्होंने वर्ष 1955 में विमलेश्वरी सहाय से शादी की।

साहित्यिक सफर

रघुवीर सहाय ने साहित्य के क्षेत्र में अपनी लेखनी वर्ष 1946 से चलाना आरंभ की। वह हिंदी में पद्य विधा की नई कविता के कवि थे। उनकी कुछ कविताएं साहित्यकार अज्ञेय द्वारा संपादित दूसरा सप्तक में संकलित हैं।

वह कविता लेखन के अलावा रचनात्मक और विवेचनात्मक गद्य भी लिखा करते थे। उन्होंने काव्य-रचना में पत्रकार की दृष्टि का सर्जनात्मक उपयोग किया। वह मानते थे कि अखबार की खबरों के भीतर दबी और छिपाई गई ऐसी खबरें होती हैं जिनमें मानवीय पीड़ा छिपी रह जाती है। इन छिपी हुई मानवीय पीड़ा की अभिव्यक्ति करना ही कविता का दायित्व है।

उनकी पत्रकारिता उनकी कविताओं को दमदार और प्रासंगिक बनाती है। इसस उनकी कविताएं सत्य के बेहद करीब बन गई थी। सहाय ने अपनी कविताओं में माध्यम से रोजमर्रा के किस्सों को अपने काव्य में जगह दी। उन्होंने अपने काव्य में मुहावरों को कुशलता के साथ जगह दी, जिनका प्रयोग करने वाले वह आधुनिक सशक्त कवि थे।

उनकी कविताओं में आजादी के बाद आए भारत में राजनीतिक परिवर्तन की तस्वीर को समग्रता में पेश करती हैं। जिनमें आजादी के बाद बने नए मानवीय संबंधों पर हैं। जिसमें गैर बराबरी, अन्याय और गुलामी न हो। उनकी समूची काव्य-यात्रा का केंद्रीय लक्ष्य ऐसी जनतांत्रिक व्यवस्था की निर्मित करना है जिसमें शोषण, अन्याय, हत्या, आत्महत्या, विषमता, दासता, राजनीतिक संप्रभुता, जाति-धर्म में बंटे समाज के लिए कोई जगह न हो। जिन उम्मीदों और सपनों के लिए देश की आजादी की लड़ाई लड़ी गई थी उन्हें साकार करने में जो बाधाएं आ रही है उन पर लगातार विरोध उनकी काव्य रचना का लक्ष्य रहा है।

रचनाएं

रघुवीर सहाय की पहली रचना ‘सीढ़ियों पर धूप’ (1960) हैं। इसके बाद उनकी प्रमुख रचनाएं- ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ (1967), ‘हँसो-हँसे जल्दी हँसे’ (1974), ‘लोग भूल गए है’ आदि हैं।

उन्हें ‘लोग भूल गए हैं’ कृति के लिए वर्ष 1984 के साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

भाषा-शैली

रघुवीर सहाय ने अपनी काव्य-शैली में सरल, सहज और सधी हुई भाषा का प्रयोग किया है। उनकी भाषा शहरी होते हुए भी सहज व्यवहार वाली है, सजावट की वस्तु नहीं।

निधन

रघुवीर सहाय का 30 दिसंबर, 1990 को निधन हो गया।

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