नासा विमानों के बारे में वह अध्ययन करेगा, जिसके बारे में अब हर कोई जानना चाहता है!

Views : 1832  |  0 minutes read
chaltapurza.com

हाल में भारतीय वायुसेना का एक मालवाहक एयरक्राफ्ट एएन-32 दुर्घटनाग्रस्‍त हो गया जिसमें सवार सभी 13 एयरफोर्स कर्मी मारे गए हैं। इस विमान ने 3 जून को असम के जोरहाट एयरबेस से उड़ान भरी थी, लेकिन यह अरुणाचल प्रदेश में लापता हो गया था। एयर ट्रैफिक कंट्रोल से सिग्नल टूट जाने के कारण विमान के क्रैश होने की आशंका जताई जा रही थी जिसके लिए कई दिनों से इस विमान की खोज जारी थी। 11 जून, 2019 को अरुणाचल प्रदेश स्थित सियांग के जंगलों में विमान का मलबा मिला। इसके बाद से यह सवाल उठ रहे हैं कि आख़िर विमानों के सिग्नल अचानक क्यों टूट जाते हैं। इसके लिए अब नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) इस पर खास अध्ययन करने जा रहा है।

दरअसल, नासा छोटे सैटेलाइट का एक जोड़ा अंतरिक्ष में भेजकर यह अध्ययन करना चाहता है कि किस तरह से सैन्य और एयरलाइन संचार, रेडियो, जीपीएस सिग्नल आदि पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में गुजरने के दौरान अचानक टूट जाते हैं। जानकारी के अनुसार, 24 जून को अमरीकी रक्षा विभाग के अंतरिक्ष परीक्षण कार्यक्रम में लॉन्च होने वाले कुल 24 सैटेलाइट के साथ दो जुड़वा ई-टीबीईएक्स (एनहैंस्ड टैंडम बीकन एक्सपेरीमेंट) क्यूबसैट भी लांच किए जाने हैं।

chaltapurza.com

ई-टीबीईएक्स क्यूबसैट करेगा अध्ययन

नासा द्वारा भेजे जाने वाला सैटेलाइट ई-टीबीईएक्स क्यूबसैट यह अध्ययन करेगा कि आयन मंडल में (पृथ्वी से 80 किमी के ऊपर का वायुमंडल) हवा से बने बुलबुलों में किस तरह से रेडियो सिग्नल खो जाते हैं। इसकी सबसे ज्यादा समस्या भूमध्य रेखा के ऊपर होती है। साइंटिस्ट का कहना है कि सबसे पहले समझने की बात यह है कि आयन मंडल में बुलबुले विकसित कैसे होते हैं। क्योंकि जितना इनके बारे में जान सकेंगे उतना ही समस्या का निराकरण किया जा सकेगा। अभी तक वैज्ञानिक यह अनुमान नहीं लगा पाए हैं कि ये बुलबुले कब बनते हैं और कब खत्म हो जाते हैं।

chaltapurza.com
कठिन है धरती से इन बुलबुलों के बारे में अध्ययन करना

नासा में ई-टीबीईएक्स मिशन के पेलोड प्रोग्राम मैनेजर रिक डो ने बताया कि धरती से इन बुलबुलों के बारे में अध्ययन करना बहुत कठिन काम है। आयन मंडल का आयतन अपनी निचली परत से कई गुना अधिक है, पर यहां हवा की कुल मात्र निचले वायुमंडल की मात्रा के 200वें भाग के बराबर है। यहां पर हवा के कण आयनित होते हैं। इसका मतलब है कि ये पॉजिटिव और निगेटिव में बंट जाते हैं, जिनको प्लाज्मा कहा जाता है।

Read More: राजस्थान में जन्में ‘शहंशाह-ए-ग़ज़ल’ का इंतकाल एक पाकिस्तानी के रूप में हुआ!

इधर, भारत अंतरिक्ष में खुद का स्पेस सेंटर बनाने की तैयारी जुट गया है। जानकारी के लिए आपको बता दें कि यह भारतीय इतिहास के सबसे ज्यादा महत्वकांक्षी प्रॉजेक्ट्स में से एक होगा। इसरो प्रमुख के. सिवन ने स्वयं गुरुवार को इसकी जानकारी दी। भारत ने इस प्रॉजेक्ट के लिए 2030 तक की तारीख तय की है। इस प्रॉजेक्ट के सफल होने के बाद भारत तीन देशों- अमेरिका, रूस और चीन की श्रेणी में आ आएगा।

COMMENT