देश के पहले ग्रामीण विश्वविद्यालय की स्थापना की थी समाज सुधारक नानाजी देशमुख ने

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समाज सुधारक और भारतीय जनसंघ के नेता चंडिकादास अमृतराव देशमुख यानि नानाजी देशमुख की 11 अक्टूबर को 105वीं जयंती है। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए कार्य किया। नानाजी देशमुख को मरणोपरांत वर्ष 2019 में भारत सरकार द्वारा देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया था। वह राज्यसभा के सदस्य भी रहे थे। ऐसे में इस खास मौके पर जानते हैं उनके जीवन के बारे में कुछ अनसुने किस्से…

नानाजी देशमुख का जीवन परिचय

समाज सुधारक नानाजी देशमुख का जन्म 11 अक्टूबर, 1916 को महाराष्ट्र राज्य के परभानी जिले के कदोली गांव में हुआ था। उनका परिवार मराठी भाषी ब्राह्मण था। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी इसलिए अपनी पढ़ाई के लिए पैसे जुटाने के लिए सब्जी बेचने का काम भी किया।

उन्होंने राजस्थान के सीकर में रह कर हाई स्कूल में पढ़े, जहां उन्हें छात्रवृत्ति प्रदान की गई। उन्होंने बिड़ला कॉलेज (अब बिट्स पिलानी) में पढ़ाई की। इसी वर्ष नानाजी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में भी शामिल हो गए। उनकी गतिविधियों का केंद्र राजस्थान और उत्तर प्रदेश रहा था। तत्कालीन आरएसएस प्रमुख एम.एस. गोलवलकर ने उन्हें गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) में ‘प्रचारक’ के रूप में नियुक्त किया।

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मंत्रीपद का प्रस्ताव छोड़ की समाज सेवा

नानाजी देशमुख जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। बाद में यही पार्टी भारतीय जतना पार्टी के नाम से स्थापित हुई। उन्होंने आचार्य विनोबा भावे के द्वारा चालू किए भूदान आंदोलन में सक्रिय रूप से भूमिका निभाई थी। यही नहीं उन्होंने जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति का पूर्ण समर्थन दिया था।

बाद में नानाजी ने लोकसभा चुनाव लड़ा और उत्तर प्रदेश के बलरामपुर निर्वाचन क्षेत्र से सांसद चुने गए। उन्हें मोरारजी भाई देसाई सरकार में मंत्रीपद दिया गया लेकिन उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में वर्ष 1950 में देश का पहला सरस्वती शिशु मंदिर विद्यालय बनवाया था। आज इस विद्यालय की पूरे देश में 30,000 से अधिक शाखाएं चल रही हैं।

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स्वयं ने खोला देश का पहला ग्रामीण विश्वविद्यालय

समाजसेवी नानाजी देशमुख ने चित्रकूट में वर्ष 1969 में दीनदयाल रिसर्च इंस्टीट्यूट (डीआरआई) की स्थापना की। वर्ष 1981 में इन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर एकात्म मानववाद के आधार पर ग्रामीण भारत के विकास की रुपरेखा तय की। इनके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में खेतीबाड़ी, कुटीर उद्योग, ग्रामीण शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं पर कार्य किया। नानाजी ने चित्रकूट में ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना की थी, जो देश का पहला ग्रामीण विश्वविद्यालय है।

समाज सेवा के कारण राज्यसभा सदस्य नामित हुए

देशमुख को वर्ष 1999 में सामाजिक कार्यों के लिए राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा के लिए नॉमिनेट किया गया। उन्हें वर्ष 1999 में भारत सरकार ने पद्म विभूषण से सम्मानित किया।

नानाजी का निधन

नानाजी देशमुख का निधन 93 साल की उम्र में 27 फरवरी, 2010 को चित्रकूट में हुआ था। उन्होंने अपने पार्थिव शरीर को मृत्यु से पूर्व ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (एम्स) को स्वेच्छा से दान कर दिया था।

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