मणिकर्णिका: कहानी 19 वीं सदी की, राष्ट्रवाद आज का लगता है

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मणिकर्णिका का ट्रेलर फिलहाल ट्रेंड कर रहा है। ट्रेलर देख कर एक बात तो साफ हो जाती है कि कंगना रनौत ने फिल्म से पहले ही “फिल्म” जैसा ही माहौल अपने लिए तैयार कर लिया था। फिल्म का ट्रेलर नरेन्द्र मोदी जी के राष्ट्रवाद से जरूर मेल खाता है।

ट्रेलर से मालुम होता है कि मणिकर्णिका फिल्म में “एक्टर” कंगना रनौत और “देशभक्त” कंगना रनौत का मिला जुला रूप देखने को मिलेगा।  ऐसे तो फिल्म 19 वीं सदी की कहानी हमें बयान करेगी लेकिन ट्रेलर देखकर लगता है कि राष्ट्रवाद आज का ही है।

पद्मावत के बाद इतिहास पर फिल्म बनाना फिलहाल डायरेक्टर्स को भारी पड़ सकता था लेकिन माहौल देखकर लगता है कि मणिकर्णिका के लिए सब ठीक होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि फिल्म या असल कहानी की भी बात करें तो यहां दुश्मन मुगल नहीं है।

इतिहास की जिन भी फिल्मों पर विवाद होता आया है उनमें अधिकतर दुश्मन मुगल ही होते हैं। पद्मावती और खिलजी को ही ले लीजिए। ब्रीटिश एकदम सेफ दुश्मनों में से एक है। जहां पर विवाद का तो सवाल ही नहीं उठता। सभी इससे खुश होंगे। किसी को फर्क नहीं पड़ेगा कि कंगना रनौत फिल्म में दहाड़ते हुए अंग्रेजों के सिर काटेगी। सभी इससे खुश ही होंगे।

फिल्मों का इतिहास फिलहाल इतिहास नहीं रहा। इतिहास की फिल्म में भी आपको आज की झलक पेश की जाती है। खैर इतिहास जो भी था, क्या था, क्या नहीं था उस बहस में नहीं जाते।

आते हैं कंगना पर। कंगना और भारत के आज के राष्ट्रवाद के साथ काफी वक्त से नाता रहा है। कुछ ही महीनों पहले की बात है जब कंगना सद्धगुरू के साथ बातचीत कर रहीं थी। बातचीत दौरान उन्होंने “लिबरल”(उदारवादी) लोगों को अपना निशाना बनाया और उस वक्त उन पर मॉब लींचिंग को सामान्य बताने का आरोप भी लगा। लींचिंग पर बिना किसी फैक्ट्स और तुक के बात करने के बाद सद्धगुरू ने कहा कि हिंसा पर जो लोग डिबेट करते हैं उन्होंने कभी इंडिया देखा नहीं है और शहरों में रहते हुए इन सब चीजों पर बात करते रहते हैं।

देश के कई लिबरल्स को अटपटा लगा कि क्वीन जैसी मूवी में भूमिका करने के बाद कैसे कंगना सो कोल्ड राष्ट्रवाद में उलझ सकती हैं। कंगना का मानना है कि वो नरेन्द्र मोदी की फैन हैं और देश के लिए वे ही सही रोल मॉडल हैं। खैर ऐसा सोचना या कहना ये उनकी नीजि समस्या है।

संयोग से कंगना के विचार फिल्म के ट्रेलर में देखने को मिलते हैं। शायद संयोग से ही कंगना के विचार देश की सत्ताधारी सरकार से जा मिलते हैं। जहां एक्टर्स को प्रोग्रेसिव और कला से जुड़ा माना जाता है वहीं कंगना उन कुछ एक्टर्स में से एक हैं जो राष्ट्रवाद पर बहस करने से कतराती नहीं है। शायद इसी वजह से उन्होंने पाकिस्तानी एक्टर्स का इंडिया में लगे बैन का समर्थन किया था।

शायद इसी वजह से कंगना हमें याद दिलाती हैं कि “अगर अमेरिकी अपने राष्ट्रगान पर खड़े होते हैं तो हमें क्यों ऐसा करने से शर्म आती है। अमेरिका से अगर सीखना है तो कुछ अच्छा सीखो।“ लेकिन असल में अमेरिकी फुटबॉल खिलाड़ी राष्ट्रीय गान के दौरान घुटने भी टेकते हैं। और यह मुद्दा राष्ट्रीय गान के लिए खड़े नहीं होने के बारे में कभी नहीं था। यह उस व्यक्ति को मारने या गिरफ्तार करने के बारे में था।

सीधे तौर पर अगर देखा जाए तो इस देश के बहुसंख्यक नेताओं की नजर से देखें तो कंगना उनके लिए एक बेहतरीन वक्ता साबित होती हैं। कंगना ने सद्धगुरू के साथ टॉक शो में कहा कि “लिबरल कौन है? ये वो लोग हैँ जो आपको तब तक अपने साथ नहीं आने देते जब तक की आप भी उनसे नफरत नहीं करते जितने वो करते हैं।“ क्या आपने वो सुना?

लिबरल्स को कंगना एक तरह से कट्टरपंथी बता रही हैं। खैर जो भी हो कंगना को इस फिल्म के लिए सराहना ही मिलेगी विवाद का सवाल ही नहीं उठता। इतिहास जानना है तो सही किताबें आपकी मदद कर भी सकें। पद्मावत के बाद पता चल ही गया होगा कि फिल्मों के भरोसे इतिहास नहीं मिलेगा। मणिकर्णिका में भी ऐसा ही कुछ है। उस वक्त की घटनाओं को ऐसा बना दिया जाता है जैसे आज पर तंज कस रही हों।

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