कवि प्रदीप: वो गीतकार जिसके गीतों को सुन आज भी लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं

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Kavi-Pradeep

‘ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में फर लो पानी

कुछ याद उन्हें भी कर लो, जो लौट के फिर ना आएं’

​जब भी ये गीत हमारे कानों में गूंजता है तो देशप्रेम की भावना से हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इसके पीछे सिर्फ एक ही नाम है हिंदी सिनेमा के राष्ट्रकवि रामचंद्र नारायणजी  द्विवेदी जी, जिन्हें दुनिया कवि प्रदीप के नाम से भी जानती है। जब भी उनके बारे में बात होती है तो देशप्रेम की भावना से हर कोई सराबोर हो जाता है। बेबाक शैली के लिए जाने वाले कवि प्रदीप 6 फ़रवरी को बर्थ एनिवर्सरी है। ऐसे मौके पर जानते हैं उनके बारे में दिलचस्प बातें..

कम उम्र में कवि सम्मेलनों का हिस्सा बने

कवि प्रदीप का जन्म 6 फ़रवरी, 1915 को उज्जैन के बड़नगर में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनकी परवरिश मध्यमवर्गीय परिवारों की तरह ही हुई। अपने शहर में शुरूआती पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया, जहां से अपनी स्नातक की शिक्षा पूरी की। कॉलेज के दिनों में ही प्रदीप को हिंदी के प्रति लगाव हो गया था। उन्होंने बहुत कम उम्र में कवि सम्मेलनों में भाग ​लेना शुरु कर दिया था। देश के प्रति लगाव 25 साल की उम्र से ही उनकी रचनाओं में देखा जाने लगा।

साल 1940 में आई फिल्म ‘बंधन’ में उनका लिखे गाने ‘चल चल रे नौजवान’ ने उनको पहचान दिलाई। सिनेमा जगत में कवि प्रदीप के उत्कृष्ट योगदान को देखते हुए वर्ष 1997 में उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान ‘दादा साहेब फाल्के’ से सम्मानित किया गया।

फिल्म के बाद दोबारा चलाया जाता था प्रदीप का गाना

अपने सुपरहिट गीत के बाद कवि प्रदीप ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और एक के बाद एक बेमिसाल गाने लिखते चले गए। फिल्म ‘किस्मत’ में उनका लिखा देशभक्ति गीत ‘दूर हटो ऐ दुनियावालों हिंदुस्तान हमारा है’ करोड़ों भारतीयों का पसंदीदा गाना बन गया। इस गीत की लोकप्रियता का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि जब सिनेमा हॉल में फिल्म खत्म होती थी तो लोगों के लिए ये गाना अलग से फिर चलाया जाता था।

गीतों में दिखती थी देशभक्ति की झलक

कवि प्रदीप को अपने फिल्मी कॅरियर में देशभक्ति गीतों से ज्यादा लोकप्रियता मिली। उनके देशभक्ति गीतों में कई यादगार गीत जैसे ‘आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की’, ‘हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के’ और ‘दे दी हमें आजादी बिना खड़ग बिना ढाल साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’ जैसे गीत शामिल हैं।

जब ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गीत सुन रोने लगे लोग

प्रदीप की कलम से जब ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’… गीत निकला तब स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने उस गीत को अपने सुरों में पिरोया। कहा जाता है कि यह गाना जब भारत के पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को सुनाया गया तो उनकी और लाखों लोगों की आंखें भर आई। कवि प्रदीप ने अपने कॅरियर में 72 फिल्मों के लिए करीब 1700 से भी अधिक गाने लिखे।

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आजादी के बाद आज भी कवि प्रदीप के गीत जब भी भारतीयों के कानों में पड़ते हैं तो धड़कनें तेज हो जाती है। प्रदीप जैसे सितारे सदी में बहुत कम ही पैदा होते हैं। उनके गीत आज भी देशवासियों के भीतर राष्ट्रभक्ति जज़्बा जगाता हैं। देशभक्ति ​के गीतों से सरोबार करना वाले कवि प्रदीप 11 दिसंबर, 1998 को मुंबई में दुनिया से रुख़सत होकर हमेशा के लिए देवलोक को चले गए।

 

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