हसरत जयपुरी: बस कंडक्टर से मशहूर गीतकार बनने तक का दिलचस्प सफ़र रहा

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राजस्थान की मिटटी ने वीर योद्धा भी पैदा किए हैं तो कवि, शायर और गीतकार भी। इस मिटटी की करामात है कि जब भी कोई नाम कमाने निकला वो शख़्स हीरा बनकर चमका। बाॅलीवुड के मशहूर गीतकार हसरत जयपुरी ने भी राजस्थान की धरती पर ही जन्म लिया था। वैसे तो हरसत साहब को दुनिया छोड़े करीब 20 बरस हो चुके हैं लेकिन उनके एक से बढ़कर एक नगमों की बदौलत आज भी वे लोगों के दिल में बसे हुए हैं। हरसत जयपुरी का जन्म आज ही के दिन 15 अप्रैल, 1922 को जयपुर में हुआ था। उनके एक शायर से लेकर बस कंडक्टर बनने, मिटटी के खिलौने बेचने से फैक्ट्री में मजदूरी करने और यहां बाॅलीवुड पहुंचने तक का सफ़र बड़ा दिलचस्प रहा। ऐसे में आइये जानते हैं जयपुरी के जन्मदिन के अवसर पर उनको थोड़ा और करीब से..

हसरत जयपुरी को विरासत में मिली थी शायरी

जयपुर में जन्में हरसत जयपुरी का असल नाम इकबाल हसैन था लेकिन उन्हें प्रसिद्धि हरसत जयपुरी नाम से मिलीं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा जयपुर में हुई थी इसके बाद उन्होंने अपने नाना से उर्दू और पर्शियन की तालीम हासिल की। हसरत को शायरी विरासत में मिली थी। उनके नाना फ़िदा हुसैन अपने जमाने के मशहूर शायरों में से एक थे। हसरत जयपुरी रात को औरत बना देते और फिर उस पर सितारे भी लपेट देते थे। फिल्मों में टाइटल साॅन्ग लिखना सबसे कठिन माना जाता है और हसरत साहब फिल्मों के टाइटल साॅन्ग लिखने के मास्टर माने जाते थे। उन्होंने इस मुश्किल काम को इस अंदाज में अंजाम दिया कि फिर तो एक धारणा सी बन गई थी कि हसरत जिस फिल्म का टाइटल साॅन्ग लिखेंगे उसका हिट होना तय है।

उनके ऐसे गीतों का लंबा सिलसिला चला था जिसमें ‘दीवाना मुझको लोग कहें दीवाना, दिल एक मंदिर है दिल एक मंदिर, रात और दिन दिया जले, रात और दिन, एक घर बनाऊंगा तेरे आंगन के सामने, एन ईवनिंग इन पेरिस जैसे कई टाइगल साॅन्ग उन्होंने लिखे थे। हसरत ने जो शब्द तब तक कहीं अस्तित्व में नहीं थे, उन्हें भी गीतों में पिरोकर न सिर्फ उन्हें नए अर्थ दिए बल्कि उनमें मिठास घोलने का काम किया। उन्हीं में से एक गीत है रम्मैया वस्तावैया। यह बड़ा हिट गीत साबित हुआ और कुछ साल पहले इस टाइटल से बाॅलीवुड में एक फिल्म भी बनीं है। फिल्म राम तेरी गंगा मैली का टाइटल साॅन्ग हसरत के हाथ नीहं लगा लेकिन इस फिल्म का पाॅपुलर गीत ‘सुन साहिबा सुन’ उन्होंने ही लिखा था। इसके करीब दस साल बाद उनके पास टाइटल साॅन्ग लिखने का मौका आया और फिल्म हिना के लिए उन्होंने टाइटल साॅन्ग ‘मैं हूं खुशरंग हीना’ लिखा।

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बहारों फूल बरसाओ के लिए मिला था फिल्म फेयर अवाॅर्ड

‘बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है’ गाने के लिए हसरत जयपुरी साहब को 1966 में श्रेष्ठ गीतकार का फिल्म फेयर अवाॅर्ड मिला था। अपने 40 साल के फिल्मी करियर में उन्होंने 350 फिल्मों के लिए करीब 2000 गीत लिखे। इस दौरान हसरत के हिस्से में दो बार अवाॅर्ड के तौर पर फिल्म फेयर आया। जब तक घर वालों का दिया नाम इकबाल हुसैन उनके साथ जुड़ा रहा वे संघर्ष में जीवन बिताते रहे, लेकिन जब उन्होंने अपना नाम हसरत जयपुरी किया तो वे बहुत जल्दी प्रसिद्ध हो गए। हसरत साहब को फिल्मी गीतकार के रूप में पहचाना जाता है लेकिन उन्होंने गैर फिल्मी शायरी भी की और किताबें भी लिखी जो उनकी फिल्मी शोहरत में कहीं धुंधली सी पड़ गयी थी।

शायरी करते-करते ऐसे पहुंचे बाॅलीवुड तक

हसरत जयपुरी की पढ़ाई जयपुर शहर में हुई थी। ये जवान होने से पहले ही शायरी करने लग गए थे लेकिन इन्हें ये पता था कि शायरी से पेट पालना आसान नहीं है। मात्र 18 वर्ष की उम्र में ये रोजगार की तलाश में मुंबई जा पहुंचे थे। कुछ दिन एक कपड़ा मिल में काम किया, कुछ समय के लिए खिलौनों की फैक्ट्री में भी काम किया। ऐसे कुछ और छोटे-छोटे धंधे किये और आखिरकार बस कंडक्टर की नौकरी कर ली। हसरत जयपुरी शायरी तो करते ही थे, इसलिये वे मुशायरों में भी शामिल होने लगे। बहुत सरल भाषा में शायरी करने वाले हसरत को एक मुशायरे में पृथ्वीराज कपूर ने सुना था। इसके बाद उन्होंने हसरत को इप्टा के दफ्तर में बुलाया।

राजकपूर अपने निर्देशन में बन रही फिल्म ‘बरसात’ के लिए गीतकार की तलाश में थे। शैलेंद्र को वे इप्टा के समारोहों में सुन चुके थे। राजकपूर ने हसरत से भी उनका कलाम सुना और फिर शंकर, जयकिशन, शैलेंद्र, हसरत और राजकपूर की एक टीम बन गयी थी। राजकपूर के निर्देशन में 1949 में बनी पहली फिल्म बरसात से शुरूआत कर इस टीम ने हिंदी सिनेमा को एक से बढ़कर एक यादगार गीत दिये। इसी फिल्म से हसरत ने अपने पहले फिल्मी गीत ‘जिया बेकरार है छाई बहार है’ की शुरूआत की थी।

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तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे-हसरत जयपुरी

हसरत जयपुरी अपने टीम साथी शैलेंद्र और जयकिशन की मौत के बाद अकेलापन महसूस करने लगे थे। राज कपूर के निधन के बाद तो उनकी हालात बिना परों के परिंदे के समान हो गयी थी। 17 सितम्बर, 1999 को अपनी मौत से पहले हसरत साहब ने कई साल तक गुमनामी में जीवन बिताया था। 1970 में आई फिल्म ‘पगला कहीं का’ में हसरत जयपुरी ने एक गीत लिखा जो हमें हमेशा उनकी याद दिलाता रहेगा। यह गीत है ‘तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे, जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे संग-संग तुम भी गुनगुनाओगे’।

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