सरोजिनी नायडू ने 12 साल की उम्र में शुरू कर दिया था लेखन, बाद में बनी देश की पहली महिला गवर्नर

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स्वतंत्रता सेनानी, कवयित्री, कलाकार.. ना जाने कितनी पहचान लिए थीं भारत की पहली महिला गवर्नर सरोजिनी नायडू। भारत को आजादी दिलाने में कितने ही वीर सेनानियों का योगदान है, उन्हीं नामों में एक नाम सरोजिनी नायडू का नाम भी आता है। देश के लिए उनके कड़े संघर्ष को आज भी याद किया जाता है। ‘भारत कोकिला’ के नाम से पहचानी जाने वाली सरोजिनी हमारे देश की उन महिलाओं में शुमार होती हैं, जिनके हुनर को हर किसी ने माना था। महज 12 साल की उम्र में सरोजिनी के लेख और कविताएं अखबारों और पत्रिकाओं में छपना शुरू हो गए थे। आज 2 मार्च को सरोजिनी नायडू की 73वीं पुण्यतिथि है। इस मौके पर जानिए उनके बारे में कुछ रोचक बातें…

महज 12 साल की उम्र में कर ली मैट्रिक पास

हैदराबाद के निजाम कॉलेज के संस्थापक और वैज्ञानिक अघोरनाथ चट्टोपध्याय के घर 13 फरवरी, 1879 को सरोजिनी नायडू का जन्म हुआ था। पिता वैज्ञानिक तो माता सुंदरी बंगाली भाषा की एक कवयित्री थी। सरोजिनी ने बचपन से ही माता-पिता दोनों के गुणों को सहेजा और आगे चलकर उन्हें ही निखारा। सरोजिनी पढ़ाई में शुरू से ही एक होनहार छात्रा रही और आगे चलकर उर्दू, तेलुगू, इंग्लिश, बांग्ला और फारसी भाषाएं सीखीं।

सरोजिनी ने महज 12 साल की उम्र में मैट्रिक परीक्षा में सफलता हासिल कर ली थी। स्कूल की परीक्षा पास करने के बाद मद्रास प्रेसीडेंसी में एडमिशन लिया जहां भी उन्होंने पहला स्थान हासिल किया। आगे की पढ़ाई के लिए 16 साल की उम्र में वो इंग्लैंड चली गई जहां उन्होंने किंग कॉलेज लंदन में दाखिला लिया।

बचपन से ही कविताओं और नाटक में रही रुचि

सरोजिनी नायडू के घरवाले हमेशा से यही चाहते थे कि वो बड़ी होकर गणितज्ञ या वैज्ञानिक बनें, लेकिन उनकी रुचि बचपन से ही कविताओं और नाटक की ओर थी। नायडू ने आगे चलकर भारत के पर्वतों, नदियों, मंदिरों पर कई तरह की कविताएं लिखीं। सरोजि‍नी नायडू का फारसी नाटक ‘मेहर मुनीर’ और कविता संग्रह ‘द गोल्डन थ्रैशोल्ड’ को लोगों ने काफी पसंद किया।

गांव-गांव घूमकर लोगों में देश-प्रेम की जगाई थी अलख

सरोजिनी नायडू देश के स्वतंत्रता आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाली महिलाओं में से एक मानी जाती हैं। नायडू गांधी के कई सत्याग्रहों में शामिल हुई थी। वे वर्ष 1942 में ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में जेल में भी रहीं। गांधी के संदेश को नायडू ने गांव-गांव जाकर लोगों को बताया था। 2 मार्च, 1949 सरोजिनी नायडू का निधन हो गया।

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