कम पढ़े होने के बाद भी राहुल सांकृत्यायन को आखिर क्यों बुलाते थे कई देश पढ़ाने के लिए

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भारत में हिंदी यात्रा साहित्य के जनक महापंडित राहुल सांकृत्यायन का आज 126वां जन्मदिन है। उन्होंने हिन्दी साहित्य में यात्रा विवरण के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अपनी यात्राओं के दौरान जीवन के 45 साल गुजार दिये ​थे। इन जगहों की यात्राओं का विवरण उन्होंने लिखा है।

बचपन में स्कूल में पढ़ते समय उन्होंने अपने पाठ्य पुस्तक में एक शेर पढ़ा था

”सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहां,
जिंदगी गर कुछ रही, तो नौजवानी फिर कहां”

फिर क्या केदारनाथ पांडेय अपने घर से निकल गये दुनिया का सफर करने। इस सफर में उनको केदारनाथ से बाबा रामोदार दास बने जो परसा मठ के महंत थे और आर्य समाजी बन गये थे। यहीं से वे विभिन्न देशों की यात्राओं पर निकल गये और राहुल सांकृत्यायन के नाम से प्रसिद्ध हुए। ऐसे थे राहुल और उनका नारा था- चरैवति! चरैवति!, यानी चलते रहो! चलते रहो!

जीवन परिचय :—

केदारनाथ राय का जन्म 9 अप्रैल, 1893 को उत्तर प्रदेश के भूमिहार में हुआ था, जो आगे चले कर राहुल सांकृत्यायन के नाम से विख्यात हो गये। पिता का नाम गोवर्धन पाण्डेय और माता का नाम कुलवंती था। केदारनाथी की माता का निधन बचपन में ही हो गया था इस कारण वे अपने ननिहाल आ गये। यही पर उनकी प्रारम्भिक शिक्षा हुई और उन्हें वहीं के प्राथमिक विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने दाखिल करवा दिया।

देश में बाल विवाह का प्रचलन बहुत ही बड़े पैमाने पर होते थे जिसके चलते उन्हें भी बचपन में ही वैवाहिक जीवन में बंधना पड़ा किंतु वे घर छोड़कर भागे और साधु हो गए। वे दयानंद सरस्वती के अनुयायी बन गये और आर्य समाजी बन गए। साधु बन गए और उनका नाम केदारननाथ पाण्डेय से ‘रामोदर साधु’ हो गया। फिर 1930 में श्रीलंका पहुंचे और वहां बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। ‘रामोदर साधु’ से ‘राहुल’ बने और ‘सांकृत्य’ गोत्र होने के कारण सांकृत्यायन कहलाए। इन दौर में ईश्वर में उनकी आस्था खत्म हो चुकी थी, लेकिन पुनर्जन्म में यकीन बना हुआ था।

फिर क्या था अब उन्हें घर—परिवार की चिंता न थी क्योंकि अब पूरी दुनिया उनका घर बना गया। कोलकाता, काशी, दार्जिलिंग, तिब्बत, नेपाल, चीन, श्रीलंका, सोवियत संघ आदि देशों की यात्रा उन्होंने पैदल ही तय कर डाली। जहां गए, वहीं की संस्कृति—भाषा सीख ली, इन यात्राओं के दौरान उन्होंने जो ग्रहण किया और जो ज्ञान उनके पास था देकर अपने देश चले आते।

कम शिक्षा के बाद भी उनकी लगभग 30 भाषाओं पर पकड़ थी। वो भोजपुरी, हिंदी, संस्कृत, पाली, उर्दू, अरबी, फारसी, सिंघली (श्रीलंका), तमिल, कन्नड़, फ्रेंच और रूसी आदि भाषाओं के जानकार थे। उन्होंने 140 किताबें लिखी थीं, जिनकी विषय—वस्तु इतिहास से लेकर दर्शन तक विस्तृत थी।

वे विभिन्न देशों की यात्राओं से प्राप्त अनुभवों को बड़े ही रोचक और विस्तृत रूप से लिखने की कला के धनी थे। इसीके चलते उन्होंने “मेरी लद्दाख यात्रा” में सभी धार्मिक, ऐतिहासिक और पारंपरिक जगहों और रिवाजों का विस्तृत विश्लेषण किया था।

राहुल सांकृत्यायन को उनके जीवन के अनुभवों ने पंडित से महापंडित बनाया। उनके इन्हीं अनुभवों से आज भी अनेकों लोग सीखते हैं। राहुल जी की विद्यवता के कारण ही सोवियत संघ और श्रीलंका में पढ़ाने के लिए उन्हें बुलाया गया। यह असधारण बात है और यह उनके असाधारण व्यक्तित्व का परिचायक भी है।

उन्होंने अपने यात्रा के दौरान श्रीलंका में बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया था और बौद्ध भिक्षु बन गये। बाद में मार्क्सवादी बन गये। सांकृत्यायन एक भारतीय नागरिक थे लेकिन अंग्रेजों के विरुद्ध लेख लिखने की वजह से उन्हें तीन साल जेल भी जाना पड़ा था। उनके महानतम कार्यो के लिये उन्हें महापंडित कहा जाता था। वे बहुभाषी और बहुशास्त्री दोनों ही थे।

1963 में उनके कार्यों को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया था। 1958 में उन्हें अपनी किताब ‘मध्य एशिया का इतिहास’ के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था।

राहुल सांकृत्यायन का साहित्य में योगदान

सांकृत्यायन बहुभाषी होने के कारण अनेक भाषाओ में पुस्तकें लिखकर साहित्य सेवा की है।

उन्होंने 20 साल की उम्र में लेखन के क्षेत्र में हाथ आजमाना शुरू कर दिया। उन्होंने बौद्ध धर्म ग्रंथ मज्झिम निकाय का प्राकृत से हिंदी अनुवाद किया। हिन्दी में उनकी एक प्रसिद्ध किताब ‘वोल्गा से गंगा’ (वोल्गा से गंगा तक की यात्रा) है- जिसमे इन्होंने ऐतिहासिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए वोल्गा नदी और गंगा नदी तक के इतिहास का वर्णन किया है।

उनकी यह किताब 6000 BC में शुरू हुई और 1942 ई. पर खत्म हुई, यह वह समय था जब महात्मा गांधी भारत छोडो आंदोलन के भारतीय राष्ट्रीय नेता थे।

राहुल का चरित्र बहुत ही आकर्षक और महान था।

विवाह और अंतिम समय

राहुल सांकृत्यायन ने अपने जीवन में तीन शादियां की थी। पहली शादी बचपन में हो गई। उनकी पत्नी का नाम संतोषी देवी था, जिनसे वे अपने जीवन काल में एक बार मिले थें

जब वे रूस में 1937-38 ई. में लेनिनग्राद यूनिवर्सिटी में पढ़ाने के लिए गये थे, उस दौरान उनकी मुलाकात लोला येलेना से हुई। दोनों में प्रेम हुआ और शादी हुई। वहीं उनके बड़े बेटे इगोर का जन्म हुआ।

जब वो भारत लौटे, तो उनकी पत्नी और बेटा वहीं रह गए।

जीवन के आखिरी दौर में उनकी शादी डॉ. कमला से हुई। उनसे तीन संतान हुईं। एक बेटी और दो बेटे।

अपने जीवन काल में कम शिक्षित होने के बाद भी उस मुकाम पर पहुंच गये की वे एक मील का पत्थर बन गए। ऐसे मानुष का 70 साल की अवस्था में 14 अप्रैल, 1963 को दार्जिलिंग में निधन हो गया।

राहुल सांकृत्यायन के उपन्यास:—

बीसवी सदी-1923
जीने के लिये-1940
सिम्हा सेनापति-1944
जय यौधेय-1944
भागों नहीं, दुनिया को बदलो-1944
मधुर स्वप्न-1949
राजस्थानी रानिवास-1953
विस्मृत यात्री-1954
दिवोदास-1960
विस्मृत के गर्भ में

राहुल सांकृत्यायन की लघु कथा-
सतमी के बच्चे-1935
वोल्गा से गंगा-1944
बहुरंगी मधुपुरी-1953
कनैला की कथा-1955-56

आत्मकथा-
मेरी जीवन यात्रा I-1944
मेरी जीवन यात्रा II-1950
मेरी जीवन यात्रा III,IV, V- एकसाथ प्रकाशित की गयी

जीवनी:—

सरदार पृथ्वी सिंह-1955
नये भारत के नये नेता-1942
बचपन की स्मृतिया-1953
अतीत से वर्तमान-1953
स्टॅलिन-1954
लेनिन-1954
कार्ल मार्क्स-1954
माओ-त्से-तुंग-1954
घुमक्कड़ स्वामी-1956
मेरे असहयोग के साथी-1956
जिनका मैं कृतज्ञ-1956
वीर चन्द्रसिंह घरवाली-1956
सिंहला घुमक्कड जयवर्धन-1960
कप्तान लाल- 1961
सिंहला के वीर पुरुष-1961
महामानव बुद्ध-1956

उनकी कुछ और किताबे:

मानसिक गुलामी
ऋग्वेदिक आर्य
घुमक्कड़ शास्त्र
किन्नर देश में
दर्शन दिग्दर्शन
दक्खिनी हिंदी का व्याकरण
पुरातत्व निबंधावली
मानव समाज
मध्य एशिया का इतिहास
साम्यवाद ही क्यों

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