धोंडो केशव कर्वे देश के पहले जीवित व्यक्ति थे जिन पर डाक विभाग ने जारी किया टिकट

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आजादी के समय महिलाओं के उत्थान में विशेष भूमिका निभाने वाले समाज सुधारक धोंडो केशव कर्वे (डी के कर्वे) की 18 अप्रैल को 164वीं जयंती है। उन्हें ‘महर्षि कर्वे’ के नाम से भी जाना जाता है। कर्वे ने विधवा विवाह और स्त्री शिक्षा को बढ़ा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वर्ष 1958 में डी के कर्वे को भारत सरकार ने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से उनके 100वें जन्मदिन पर सम्मानित किया था। एक दिलचस्प बात ये है कि वे भारत के पहले जीवित व्यक्ति थे, जिन पर भारतीय डाक विभाग ने टिकट जारी किया था।

उन्हें कभी-कभी लोग प्यार से ‘अन्ना कर्वे’ भी कह देते थे। मराठी भाषी लोगों ‘अन्ना’ शब्द का उपयोग अक्सर किसी के पिता या बड़े भाई को संबोधित करने के लिए किया जाता है। उनके सम्मान में मुंबई (बॉम्बे) में रानी की सड़क का नाम बदलकर महर्षि कर्वे रोड किया गया।

धोंडो केशव कर्वे का जीवन परिचय

डी के कर्वे का जन्म 18 अप्रैल, 1858 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के शेरावली गांव में निम्न वर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम केशवपंत और माता लक्ष्मीबाई था। उनके परिवार की ​आर्थिक स्थिति खराब थी। प्रारंभिक शिक्षा के लिए उन्हें दूसरे गांव में पैदल जाना पड़ता था। उन्होंने वर्ष 1881 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मुंबई के एलफिंस्टन कॉलेज में दाखिला लिया। यहां से उन्होंने वर्ष 1884 में गणित में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की। धोंडो केशव कर्वे का विवाह मात्र चौदह वर्ष की आयु में आठ वर्षीय राधा बाई के साथ हुआ था। वर्ष 1891 में उनकी पत्नी राधा बाई का निधन हो गया था।

स्नातक पास करने के बाद बतौर शिक्षक पढ़ाने लगे

डी के कर्वे अपनी स्नातक डिग्री उत्तीर्ण करने के बाद एलफिंस्टन स्कूल में बतौर शिक्षक पढ़ाने लगे थे। वर्ष 1891 में उन्होंने पूना के प्रसिद्ध फर्ग्युसन कॉलेज में गणित विषय पढ़ाना शुरू कर दिया। क्योंकि आजादी के समय बाल गंगाधर तिलक अधिक व्यस्त रहते थे, इस कारण उन्हें वहां पढ़ाने का मौका मिला था। उन्होंने यहां पर वर्ष 1914 तक अध्यापन का कार्य किया। इस दौरान धोंडो केशव कर्वे की मुलाकात देशभक्त और समाज सेवी गोपालकृष्ण गोखले, दादा भाई नौरोजी और महादेव गोविंद रानाडे जैसे महापुरुषों से हुईं। इनसे वे इतने प्रभावित हुए कि समाज सेवा को ही उन्होंने अपने आगे के जीवन का उद्देश्य बना लिया।

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महिलाओं के उत्थान में रहा अहम योगदान

वर्ष 1907 में डी के कर्वे ने पूना के नजदीक हिंग्न्या गांव की एक झोपड़ी में बालिकाओं के लिए पाठशाला शुरू कीं। अपनी मेहनत और प्रतिभा से वे ‘डेक्कन शिक्षा समिति’ के आजीवन सदस्य भी बन गए थे। उन्होंने अपनी पहली पत्नी की मृत्यु के बाद वर्ष 1893 में अपने मित्र की विधवा बहन गोपूबाई से शादी कर ली। कर्वे ने कई स्थानों पर विधवाओं के पुनर्विवाह भी करवाए। वर्ष 1896 में उन्होंने पूना के हिंगले नामक स्थान पर दान से प्राप्त भूमि पर विधवा आश्रम और अनाथ बालिका आश्रम की स्थापना की। धोंडो केशव कर्वे के समाज सुधार कार्यों में धीरे-धीरे लोग भी रुचि लेने लगे और उन्हें तन, मन और धन से सहयोग देने लगे।

वर्ष 1907 में महर्षि कर्वे ने महिलाओं के लिए ‘महिला विद्यालय’ की स्थापना कीं। उन्होंने हर गांव में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए चंदा एकत्र किया और करीब 50 से अधिक प्राइमरी विद्यालयों की स्थापना की थी। वर्ष 1916 में डी के कर्वे ने ‘महिला विश्वविद्यालय’ की नींव रखीं। कुछ वर्षों के बाद यह विद्यालय उनके मार्गदर्शन में विधवाओं को समाज में आत्मनिर्भर बनाने वाला एक अनूठा संस्थान बन गया था।

कई पुरस्कार और सम्मानों से नवाजे गए

डी के कर्वे को उनके द्वारा किए गए समाज सेवी कार्यों के लिए कई पुरस्कार और सम्मानों से स​म्मानित किया गया। श्री महर्षि कर्वे को बनारस विश्वविद्यालय ने डॉक्टरेट की मानद उपाधि से नवाजा। वर्ष 1951 में पूना विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट. की उपाधि दीं। धोंडो केशव कर्वे को उनके महान समाज सुधार कार्यों के सम्मान स्वरूप वर्ष 1955 में भारत सरकार ने ‘पद्म भूषण’ पुरस्कार से सम्मानित किया।

उन्हें श्रीमती नत्थीबाई भारतीय महिला विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट. की उपाधि से नवाजा गया। जब वे 100 वर्ष के हुए तो वर्ष 1957 में मुंबई विश्वविद्यालय ने उन्हें एल.एल.डी. की उपाधि से सम्मानित किया। वर्ष 1958 में उन्हें भारत सरकार ने देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘भारत रत्न’ से नवाजा।

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डी के कर्वे का निधन

अपना जीवन विधवा महिलाओं और स्त्री शिक्षा में गुजार देने वाले धोंडो केशव कर्वे का 105 वर्ष की उम्र में 9 नवंबर, 1962 का देहांत हो गया था।

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