दयानंद सरस्वती ने वैदिक धर्म में आए आडम्बरों को दूर करने पर दिया था जोर

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Swami Dayanand Saraswati

भारतीय दार्शनिक, समाज सुधारक और आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती की 12 फरवरी को 196वीं जयंती हैं। उन्होंने वैदिक धर्म को पुनर्स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण कार्य किया था। उन्होंने वैदिक धर्म में आए आडम्बरों को दूर करने पर बल दिया था। उन्होंने महिलाओं के लिए समान अधिकार, शिक्षा पर बल दिया। दयानंद ने पहली बार वर्ष 1876 में स्वराज पर बल देते हुए कहा था कि ‘भारत भारतीयों के लिए है।’

बचपन से ही मूर्ति पूजा का किया विरोध

दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी, 1824 को काठियावाड़ क्षेत्र (अब गुजरात के मोरबी जिले) के टंकरा में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका मूल नाम मूलशंकर था। उनके पिता दर्शन लालजी और माता अमृतबाई थीं। उनके पिता शिव भक्त थे और उन्हें भी शिव को प्रसन्न करने के उपाय सिखाते थे। उन्हें उपवास का महत्व भी सिखाया। शिवरात्रि के अवसर पर दयानंद ने रात्रि जागरण किया। उन्होंने एक चूहे को भगवान शिव पर चढ़ाए प्रसाद को खाते देखा तो उनकी आस्था को ठेस पहुंचा। इसके बाद उन्होंने मूर्तिपूजा का विरोध शुरू कर दिया। उनके इस कार्य से देश के लोगों में रोष जाग्रत हुआ और उन्हें कई बार जान से मारने की धमीक मिली। परंतु वह अपने मार्ग से नहीं हटे और समाज के सुधार के लिए लगातार कार्य करते रहे।

बाद में हैजा से उनकी छोटी बहन और चाचा की मृत्यु हो जाने से उनके जीवन का उद्देश्य बदल गया। उन्होंने विवाह नहीं किया और वर्ष 1846 में घर छोड़ दिया। उन्होंने सत्य की खोज के लिए तपस्या की। उन्होंने भौतिक वस्तुओं को त्याग दिया और आत्म-वंचना का जीवन व्यतीत किया। वह हिमालय चले गए। उन्होंने विरजानंद दंडिषा को अपना गुरु बनाया। विरजानंद का मानना था कि हिंदू धर्म अपने मूल आधार से भटक गया और इसमें कुरीतियां और आडंबर आ गए हैं। दयानंद सरस्वती ने विरजानंद को वचन दिया कि वे अपना जीवन हिंदू धर्म और वेदों को पुनर्जीवित करने में समर्पित करेंगे।

आर्य समाज की स्थापना

बाद में दयानंद ने हिंदू धर्म में सुधार के लिए 1875 में मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की। उनके द्वारा लिखित रचनाएं, आर्य समाज और हिंदू धर्म एक अद्वितीय घटक है। आर्य समाज ने सभी पुरुषों और सभी देशों के लिए समान रूप से न्याय करता है, साथ ही साथ लिंगों की समानता को भी स्वीकारता है। आर्य समाज ने हिंदू धर्म में मूर्तिपूजा, पशुबलि, पूर्वज पूजा, तीर्थ यात्रा, पुजारी, मंदिरों में चढ़ावा, जाति प्रथा, अस्पृश्यता, बाल विवाह की निंदा की है।

उन्होंने अपनी पुस्तक ‘सत्यार्थप्रकाश’ (सत्य की रोशनी) के माध्यम से स्थिर हिंदू विचारों को सुधारने के लिए नई व्याख्याएं दीं। उनके अनुसार समाज सेवा के माध्यम से मुक्ति संभव थी। उन्होंने भारतीय धर्म ग्रंथों के पठन-पाठन में महिलाओं के समान अधिकारों और उनके लिए शिक्षा का समान अधिकार की वकालत की। उन्होंने माना कि एक भाषा के माध्यम से किसी समाज के सदस्यों को एकजुट करने का अच्छा साधन है। इसलिए, उनका विचार था कि हिंदी को राष्ट्रभाषा का स्थान दिया जाना चाहिए।

उन्होंने वेदों का संस्कृत से हिन्दी में अनुवाद किया ताकि आम आदमी आसानी से वेदों को पढ़ सके। आर्य समाज प्रार्थना सभाओं और उपदेशों में नेताओं के रूप में महिलाओं की स्वीकृति में हिंदू धर्म में दुर्लभ है। आर्य समाज हिंदू धर्म में एक दुर्लभ धारा है जो हिंदू धर्म में धर्मान्तरित होने की अनुमति देता है और प्रोत्साहित करता है।

निधन

वैदिक धर्म को पुनर्स्थापित करने वाले महान दार्शनिक और समाज सुधारक दयानंद सरस्वती का निधन 30 अक्टूबर, 1883 को हुआ था। उन्हें भारत के राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन ने उन्हें “आधुनिक भारत के निर्माता” में से एक कहा, जैसा कि श्री अरबिंदो ने किया था।

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