इस वजह से ‘बाघा जतीन’ के नाम से प्रसिद्ध हुए थे क्रांतिकारी जतीन्द्रनाथ मुखर्जी

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भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और क्रांति​कारी जतींद्रनाथ मुखर्जी की 7 दिसंबर को 140वीं जयंती हैं। वह ‘बाघा जतीन’ के नाम से प्रसिद्ध थे। वह ऐसे क्रांतिकारी थे जिनके नाम से पूरे ब्रिटिश अधिकारी थर-थर कांपते थे और जिनकी सांस में आखिरी समय तक क्रांतिकारी अंदाज झलकता रहा। वह क्रांतिकारी संगठन ‘युगांतर’ के प्रमुख नेता थे जो बंगाल में क्रांतिकारी की संस्था थी।

7 दिसम्बर, 1879 को बंगाल के नदिया जिले के कुश्तिया उपखंड के कायाग्राम गांव में जन्मे जतीन को बचपन से ही माता-पिता का प्यार नसीब नहीं हुआ। 5 साल की कम उम्र में जतीन के पिता का निधन हो गया जिसके बाद इनकी माता ने ही इनका पालन-पोषण किया। जतीन्द्रनाथ मुखर्जी का असली नाम ‘जतीन्द्रनाथ मुखोपाध्याय’ था।

क्रांतिकारी जीवन

जतीन ने अंग्रेजों की हर योजना का खुलकर विरोध किया। अंग्रेजों की चलाई गई बंग-भंग योजना के खिलाफ जतीन ने मुखर अभियान चलाया। अपनी सरकारी नौकरी छोड़कर जतीन ने सक्रिय रूप से आन्दोलन का रास्ता चुन लिया। इसके अलावा वो ‘हावड़ा षडयंत्र केस’ में उन्होंने साल भर के लिए जेल की हवा भी खानी पड़ी।

हंसिये से बाघ को मारकर बने बाघा जतीन

जतीन का पूरा जीवन बहादुरी के काम करने में बीता। 27 साल की उम्र का एक किस्सा उनको लेकर काफी चर्चित है जब वो एक बार जंगल से गुजर रहे थे तभी जंगल में एक बाघ ने उन पर हमला कर दिया उन्होंने बाघ से जवाबी मुठभेड़ जारी रखी और हाथ में रखे हंसिये से बाघ को वहीं पर मार दिया। इस दिन के बाद से लोग उन्हें “बाघा जतीन” कहने लगे।

आज इस महान क्रांतिकारी के जन्मदिन पर आइए जानते हैं इनके बारे में कुछ खास बातें

– जतीन कॉलेज के दिनों में स्वामी विवेकानंद के संपर्क में आए जिसके बाद स्वामी विवेकानंद ने जतीन की प्रतिभा को पहचाना और उनमें एक भविष्य का क्रांतिकारी देखा।

– अप्रैल 1908 में एक बार वो सिलीगुड़ी रेलवे स्टेशन पर थे तभी तीन अंग्रेजी अधिकारियों की उनसे कहासुनी हो गई जिसके बाद उन तीनों को जतीन ने अकेले वहीं पीट दिया जिसके बाद अंग्रेज अधिकारियों में उनके नाम का खौफ बैठ गया।

– जतीन्द्रनाथ ब्रिटिश शासन के विरुद्ध हुए प्रमुख क्रान्तिकारियों में से एक थे। बंगाल में क्रान्तिकारियों का प्रमुख संगठन ‘युगान्तर पार्टी’ के वो मुख्य नेता थे।

– बाघा जतीन अंग्रेजों द्वारा किए गए एक हमले में बुरी तरह से घायल हो गए। आखिरकार 10 सितंबर, 1915 को उन्होंने हमले के बाद अस्पताल में आखिरी सांस ली।

– उनके निधन के बाद एक मशहूर अमेरिकी प्रचारक ने कहा था अगर ‘बाघा जतीन कुछ और सालों तक जीवित रहते तो आने वाले समय में कोई भी महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता के रूप में नहीं जान पाता।’

 

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