एक ऐसा स्वतंत्रता सेनानी जिसका ब्रिटिश हुकूमत में था खौफ

Views : 1995  |  4 minute read

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका निभाने वाले प्रखर राष्ट्रवादी, लेखक, राजनेता और स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर की 26 फरवरी को 54वीं डेथ एनिवर्सरी हैं। उन्होंने भारत माता को गुलामी की जंजीरों से मुक्ति दिलाने के लिए देश और विदेश में रहकर अंग्रेजों के विरुद्ध स्वंतत्रता आंदोलन में योगदान दिया था। यही नहीं उन्होंने काले पानी की सजा भी काटी थी। वह पहले इतिहासकार थे जिन्होंने 1857 के विद्रोह को ‘भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम’ की उपमा दी थी। वह पेशे से एक वकील, राजनीतिज्ञ, कवि, लेखक और नाटककार थे।

जीवन परिचय

क्रांतिकारी वीर सावरकर का जन्म महाराष्ट्र के नासिक जिलें में भागुर नामक गाँव में हुआ था। उनकी माता का नाम राधाबाई और पिता का नाम दामोदर पन्त सावरकर था। उनके पिता के चार संतानें थी, जिनमें दो भाई गणेश (बाबाराव) व नारायण दामोदर सावरकर तथा एक बहन नैनाबाई थीं। उनकी माता का देहांत हैजे से हो गया था, तब वह नौ वर्ष के थे। इसके सात साल बाद ही उनके पिता का भी प्लेग महामारी के दौरान 1899 ई. में देहांत हो गया।

परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी उनके बड़े भाई गणेश पर आ गई। इन कठिन परिस्थितियों में भाई गणेश के संघर्ष का उनके व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ा। वीर सावरकर ने शिवाजी हाईस्कूल, नासिक से 1901 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। उन्हें बचपन से ही पढ़ने का बहुत शौक था, साथ ही उन्होंने कुछ कविताएं भी लिखी थी। आर्थिक संकट के बावजूद बाबाराव ने विनायक की उच्च शिक्षा की इच्छा का समर्थन किया।

पढ़ाई के दौरान ही वीर सावरकर के हृदय में देश की आजादी का अलख जल चुका था, जिसके लिए उन्होंने स्थानीय नवयुवकों को संगठित करना ​शुरू कर दिया और ‘मित्र मेला’ नामक संगठन की स्थापना की। इस संगठन का उद्देश्य नवयुवकों में राष्ट्रीयता की भावना जाग्रत करके क्रांति की ज्वाला को जिंदा रखना था।

सन् 1901 में रामचन्द्र त्रयम्बक चिपलूणकर की पुत्री यमुनाबाई के साथ वह विवाह के बंधन में बंध गये। उनके ससुर ने उनकी विश्वविद्यालय की शिक्षा का भार उठाया। सन् 1902 में मैट्रिक की पढ़ाई पूरी करके उन्होंने पुणे के फर्ग्युसन कॉलेज से स्नातक की डिग्री प्राप्त की।

यह भी पढ़ें- 17वीं लोकसभा में सबसे युवा सांसद है चंद्राणी मुर्मु, जान लीजिये इनकी पूरी प्रोफाइल

देश की आजादी के लिए संघर्ष में योगदान

वीर सावरकर ने वर्ष 1904 में ‘अभिनव भारत’ नामक एक क्रान्तिकारी संगठन की स्थापना की। जब वर्ष 1905 में अंग्रेजों द्वारा बंगाल के विभाजन की घोषणा की तो सावरकर ने बंग-भंग के विरोध और स्वदेशी आंदोलन के समर्थन में पुणे में विदेशी वस्त्रों की होली जलाई। बाल गंगाधर तिलक के अनुमोदन पर वर्ष 1906 में उन्हें श्यामजी कृष्ण वर्मा छात्रवृत्ति मिली।

उनके क्रांतिकारी लेख ‘इंडियन सोशियोलाजिस्ट’ और ‘तलवार’ नामक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। उनके कई लेख कलकत्ता से प्रकाशित पत्र युगान्तर में भी छपे।

सावरकर रूसी क्रांति और क्रान्तिकारियों से ज्यादा प्रभावित थे। 10 मई, 1907 को इन्होंने लंदन स्थित इंडिया हाउस में 1857 की आजादी की लड़ाई की स्वर्ण जयन्ती मनाई। मई 1909 में उन्होंने लन्दन से बार एट लॉ (वकालत) की परीक्षा उत्तीर्ण की, परन्तु उन्हें वहां वकालत करने की अनुमति नहीं मिली।

लंदन में रहते हुए उनकी मुलाकात लाला हरदयाल से हुई, जो उन दिनों इंडिया हाउस की देखरेख करते थे। 1 जुलाई 1909 को मदनलाल धींगरा द्वारा विलियम हट्ट कर्जन वायली को गोली मार कर हत्या किये जाने के बाद उन्होंने लंदन टाइम्स में एक लेख भी लिखा था। 13 मई 1910 को पेरिस से लंदन पहुंचने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, गिरफ्तारी के बाद जब उन्हें आठ जुलाई, 1910 को एस.एस. मोरिया जहाज से भारत ले जाया जा रहा था, तो जहाज के सीवर होल के रास्ते वह समुद्र में कूद गये। लेकिन वह तैरकर जब समु्द्र के किनारे पहुंचे तो उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया।

24 दिसंबर 1910 को उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गयी। इसके बाद जनवरी 1911 को सावरकर को एक अन्‍य मामले में भी आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। इस प्रकार सावरकर को ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें सजा सुनाना विश्व इतिहास की पहली अनोखी सजा थी।

नासिक षडयंत्र काण्ड

सावरकर को नासिक जिले के कलक्टर जैक्सन की हत्या के लिए ‘नासिक षडयंत्र काण्ड’ में दोषी पाये जाने पर उन्हें अप्रैल, 1911 में अंडमान निकोबार की सेल्युलर जेल में काला पानी की सजा काटने भेज दिया गया।

वर्ष 1920 में सरदार वल्लभ भाई पटेल और बाल गंगाधर तिलक के कहने पर ब्रिटिश कानून ना तोड़ने और विद्रोह ना करने की शर्त पर उनको कैद से मु​क्त कर​ दिया गया। उन्होंने स्वीकार किया कि वर्षों तक जेल की सलाखों की पीछे रहने से अच्छा है, भूमिगत रह करके देश के लिए संघर्ष किया जाए।

उन्होंने ‘द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस- 1857’ नामक पुस्तक लिखी।

क्रांतिकारी होने के साथ—साथ वे एक समाज सुधारक भी थे। उनके राजनीतिक दर्शन में उपयोगितावाद, तर्कवाद और सकारात्मकवाद, मानवतावाद और सार्वभौमिकता, व्यावहारिकता और यथार्थवाद के तत्व मौजूद थे। सावरकर एक नास्तिक और एक कट्टर तर्कसंगत व्यक्ति थे, जो सभी धर्मों में रूढ़िवादी विश्वासों का विरोध करते थे।

निधन

भारत की आजादी में योगदान देने वाले क्रांतिकारी वीर सावरकर का निधन 26 फरवरी, 1966 को 82 वर्ष की अवस्था में बंबई में हो गया था।

COMMENT