सावित्रीबाई फुले ने महिलाओं में शिक्षा व समानता की जगाई थी अलख

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अंग्रेजी मैय्या, अंग्रेजी वाणई शूद्रों को उत्कर्ष करने वाली पूरे स्नेह से।
अंग्रेजी मैया, अब नहीं है मुगलाई और नहीं बची है अब पेशवाई, मूर्खशाही।
अंग्रेजी मैया, देती सच्चा ज्ञान शूद्रों को देती है जीवन वह तो प्रेम से।
अंग्रेजी मैया, शूद्रों को पिलाती है दूध पालती पोसती है माँ की ममता से।
अंग्रेजी मैया, तूने तोड़ डाली जंजीर पशुता की और दी है मानवता की भेंट सारे शूद्र लोक को।

ये पंक्तियां लिखी हैं भारत की पहली महिला शिक्षिका का दर्जा प्राप्त सावित्रीबाई फुले ने। आज 10 मार्च को उनकी 124वीं पुण्यतिथि है। एक महान समाज सेविका के रूप में पहचान रखने वाली फुले पेशवा शासन की विरोधी थी और उस दौर में जब अंग्रेजी को बहुत बड़ा तबका शोषक मानता था, तब सावित्री फुले इसकी हिमायती थीं। फुले इसे एक अच्छी भाषा के तौर पर देखती थीं। वे अंग्रेजी को एक ऐसा जरिया मानती थी जो शि​क्षा के क्षेत्र में बेहतरीन योगदान दे सकती थी। सावित्रीबाई फुले पेशवा शासन की बजाय अंग्रेजी शासन को अच्छा मानती थीं, क्योंकि तब कथित तौर पर महिलाओं और दलितों को शिक्षा का अधिकार नहीं था।

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17 साल की उम्र में स्कूल की प्रिंसिपल बनी

सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी, 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुआ था। उनका ज्योतिबा फुले से बाल विवाह हुआ था। ज्योतिबा के सहयोग से सावित्रीबाई ने पाश्चात्य शिक्षा हासिल की और मात्र 17 साल की उम्र में ही ज्योतिबा द्वारा खोले गए लड़कियों के स्कूल की शिक्षिका और प्रिंसिपल बनीं।

सावित्रीबाई फुले ब्राह्मणवाद की विरोधी थी। उनके अनुसार अंग्रेजो ने हमें गुलाम नहीं बनाया, बल्कि ब्राह्म्णों ने जातिवाद फैलाकर क्षुद्रों को गुलाम बना रखा है। जब अंग्रेजी शासकों का विरोध हो रहा था तब फुले ने ब्राह्म्णों के खिलाफ काफी कुछ लिखा। उनके लेखन का काफी कुछ प्रभाव लम्बे समय तक देखने को मिलता है।

वे चाहती थीं कि क्षुद्र शिक्षित हों और मेहनत करके आगे बढ़ें। उनके लिए उन्होंने लिखा :

स्वाबलंबन का हो उद्यम, प्रवृत्ति ज्ञान-धन का संचय करो मेहनत करके
बिना विद्या जीवन व्यर्थ पशु जैसा निठल्ले ना बैठे रहो करो विद्या ग्रहण
शूद्र-अतिशूद्रों के दुख दूर करने के लिए मिला है कीमती अवसर अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने का।

उस दौर में अंग्रेजी शिक्षा को अहम मानने वाली सावित्रीबाई फुले जानती थीं कि आने वाले समय में यह सर्वव्यापी भाषा होगी और हर तबके लिए फायदेमंद होगी। यह शायद उनकी दूरदर्शिता ही थी कि उन्होंने काफी जल्दी इस बात को समझ लिया था। 10 मार्च, 1897 को सावित्रीबाई फुले का पुणे में निधन हो गया था।

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