पंडित भीमसेन जोशी: जिनकी गायकी ने बताया कि रात के घुमड़ते अंधेरे में भी एक जादू होता है

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जिन लोगों ने हिमालय से उतरती गंगा की कलकल सुनी है, जिन लोगों ने उफान वाली लहरों में समंदर को सुना है, जिन लोगों ने तपते मरुस्थल में चमकते सूरज के नीचे सन्न हवाओं को महसूस किया है, वो भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया के सबसे बड़े नाम पंडित भीमसेन जोशी को भली-भांति जानते होंगे। गायकी में भजन परंपरा को विकसित करने वाले पंडित जी ने शास्त्रीय संगीत को एक नया आयाम दिया। हिंदी, कन्नड़ और मराठी संगीत में जादुई गायन करने वाले पं. भीमसेन जोशी की 4 फ़रवरी को बर्थ एनिवर्सरी है। ऐसे मौके पर जानते हैं उनके बारे में कुछ दिलचस्प बातें..

11 साल की उम्र में गुरू की तलाश में निकले

पंडित भीमसेन जोशी का जन्म कर्नाटक के गड़ग में कन्नड़, अंग्रेजी और संस्कृत के विद्वान गुरुराज जोशी के घर 4 फरवरी, 1922 को हुआ। पंडित जी के बारे में कहा जाता है कि वो 11 साल की उम्र में ही अपने गुरू की तलाश में घर से निकल गए थे। आखिरकार एक दिन उनकी गुरू की तलाश पूरी हुई और सवाई गंधर्व को उन्होंने अपना गुरू बनाया। “मैं तुम्हे संगीत तभी सिखाउंगा जब तुम पहले का सीखा हुआ सारा दिमाग से निकाल दोगे” सवाई गंधर्व की इस शर्त को मंजूर करने के बाद पंडित जी ने अपनी संगीत की शिक्षा शुरू की।

जोशी के बारे में कहा जाता है कि उनका बचपन से ही गायकी की तरफ झुकाव बढ़ गया था। अक्सर वो स्कूल से आते समय एक ट्रांजिस्टर की दुकान पर बैठकर उसकी धुनों को गाने की कोशिश किया करते थे।

पंडित जी ने 19 की उम्र में दी थी पहली प्रस्तुति

पंडित भीमसेन जोशी ने 19 साल की उम्र में ही अपनी पहली संगीत प्रस्तुति दे दी थी। पहली संगीत प्रस्तुति के बाद उन्हें काम मिलने लगा और वो रेडियो कलाकार के पद पर मुंबई में काम करने लगे। 20 साल में उन्होंने अपना पहला एल्बम भी रिलीज कर दिया। उनके पसंदीदा रागों में भोगी, पूरिया, दरबारी, मालकौंस, तोड़ी, ललित, यमन, भीमपलासी, शुद्ध कल्याण शामिल थे।

सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘भारत रत्न’ से हुए सम्मानित

पं. भीमसेन जोशी को संगीत के क्षेत्र में किए गए उनके अद्भुत काम और प्रतिभा की वजह से कई पुरस्कारों से नवाजा गया है। पंडित भीमसेन जोशी को ‘पद्म भूषण’ और ‘पद्म विभूषण’ से नवाजा गया। इसके अलावा साल 2008 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से भी उन्हें नवाजा गया। लंबी बीमारी के बाद 24 जनवरी, 2011 को पंडित जी ने आखिरी सांस ली।

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