शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यासों पर बनी चुकी हैं बॉलीवुड में कई फिल्में

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Sharatchandra Chattopadhyay

बांग्ला के लोकप्रिय उपन्यासकार और लघु कथाकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की 16 जनवरी को 82वीं डेथ एनिवर्सरी हैं। उनके द्वारा लिखित देवदास, विराज बहु, बिंदु का लल्ला, राम की सुमति, चरित्रहीन आदि प्रमुख उपन्यास हैं। उनके लेखन में ग्रामीण जन जीवन, त्रासदी और संघर्ष को चित्रित किया गया है। उन्होंने बंगाल में व्याप्त समकालीन सामाजिक प्रथाओं पर प्रहार किया। शरतचंद्र एकमात्र ऐसे कथाकार है जिनकी अधिकतर कालजयी कृतियों पर फ़िल्में और सीरियल बन चुके हैं। जिनमें प्रमुख कृतियां देवदास, चरित्रहीन और श्रीकान्त हैं।

ननिहाल भागलपुर में गुजरा बचपन

शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का जन्म 15 सितंबर, 1876 को हुगली जिले के देवानंदपुर गांव में हुआ था। शरतचंद्र नौ भाई-बहन थे। उनकी आरंभिक शिक्षा प्यारी पंडित की पाठशाला से शुरू हुई। शरत के पिता मोतीलाल बेफिक्र और स्वभाव से घुमक्कड़ थे इसलिए वे किसी एक स्थान पर रूक कर नौकरी नहीं कर सके। परिणामस्वरूप उनके परिवार की आर्थिक हालात कमजोर होती चली गई। इस वजह से शरत की किशोरावस्था ननिहाल भागलपुर में गुजरी। उनकी आगे की शिक्षा यहीं पर हुई।

शरत ने अपने नटखट स्वभाव से बचपन में काफी शरारतें की। वह अपने उम्र के मामाओं और मित्रों के साथ खूब शरारतें करते थे। ये शरारतें उनके प्रसिद्ध पात्र देवदास, श्रीकान्त, सत्यसाची, दुर्दान्त राम आदि के चरित्रों देखने को मिल जाती है। वह पढ़ाई से दूर भागता थे।

वर्ष 1983 में शरतचंद्र का एडमिशन भागलपुर दुर्गाचरण एम.ई. स्कूल में करवाया गया। छात्रवृत्ति पाकर शरत ने टी.एन. जुबिली कालेजिएट स्कूल में प्रवेश किया। वर्ष 1894 में उन्होंने मैट्रिक परीक्षा द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की।

उन्होंने 18 साल की उम्र में ‘बासा’ (घर) नामक उपन्यास लिखा, परंतु उसे प्रकाशित नहीं कर सके। वह ललित कला के छात्र थे, उनकी कॉलेज की शिक्षा अधूरी रह गई। उनके लेखन पर रवींद्रनाथ टैगोर और बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का गहरा प्रभाव पड़ा।

बाद में शरतचंद्र रोजगार के लिए बर्मा चले गए और लोक निर्माण विभाग में क्लर्क के रूप में काम किया। परंतु कुछ समय बाद वह पुन: कलकत्ता लौट आए और लेखन कार्य शुरू कर दिया। वहां से लौटने पर उन्होंने अपना प्रसिद्ध उपन्यास श्रीकांत लिखना आरंभ कर दिया। बर्मा में नौकरी के दौरान उनकी मुलाकात बंगचंद्र नामक एक शख़्स से हुई जो बड़ा विद्वान था, परंतु वह शराब का शौकीन था। शरतचंद्र के उपन्यास चरित्रहीन की प्रेरणा शायद वही था। इसमें एक मेस का वर्णन है जिसमें मेस की नौकरानी से प्रेम की कहानी है।

शरतचंद्र की प्रमुख रचनाएं

उन्होंने अपने जीवन में कई उपन्यास लिखे, उनमें प्रमुख थे पंडित मोशाय, बैकुंठेर बिल, मेज दीदी, दर्पचूर्ण, श्रीकान्त, अरक्षणीया, निष्कृति, मामलार फल, गृहदाह, शेष प्रश्न, दत्ता, देवदास, बाम्हन की लड़की, विप्रदास, देना पावना आदि प्रमुख हैं। बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन को लेकर “पथेर दावी” उपन्यास लिखा गया। पहले यह “बंग वाणी” में धारावाहिक के रूप में निकाला फिर पुस्तकाकार छपा तो तीन हजार का संस्करण तीन महीने में समाप्त हो गया। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने इसे जब्त कर लिया।

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शरतचंद्र के प्रसिद्ध उपन्यासों पर बन चुकी है कई फिल्में

उनके द्वारा लिखित उपन्यासों का कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका हैं। कहा जाता है कि उनके पुरुष पात्रों से उनकी नायिकाएं अधिक ताक़तवर हैं। शरतचंद्र की जनप्रियता उनकी कलात्मक रचना और नपे तुले शब्दों या जीवन से ओतप्रोत घटनाओं के कारण नहीं हैं बल्कि उनके उपन्यासों में नारी जिस प्रकार परंपरागत बंधनों से छटपटाती नज़र आती हैं, जिस प्रकार पुरुष और स्त्री के संबंधों को एक नए आधार पर स्थापित करने के लिए पक्ष प्रस्तुत किया गया है, उसी से शरतचंद्र को लोकप्रियता मिली। उनकी रचनाएं दिल को छू जाती हैं। पर शरत साहित्य में हृदय के सारे तत्व होने पर भी उसमें समाज के संघर्ष, शोषण आदि पर कम प्रकाश पड़ता है।

शरतचंद्र के कई प्रसिद्ध उपन्यासों पर बॉलीवुड में फिल्में भी बनी हैं। उनके ‘चरित्रहीन’ उपन्यास पर वर्ष 1974 में इसी नाम से फ़िल्म बनी थी। इसके बाद में ‘देवदास’ पर तीन बार फ़िल्म बन चुकी हैं। इसके अलावा वर्ष 1953 और 2005 में फिल्म परिणीता बनी। वर्ष 1969 में बड़ी दीदी और मंझली बहन आदि पर भी फ़िल्म निर्माण हुए हैं।

निधन

प्रसिद्ध उपन्यासकार शरतचंद्र का निधन 16 जनवरी, 1938 में को हुआ।

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