लाला हर दयाल: वह क्रांतिकारी जिसने अंग्रेजी से नफरत होने पर सिविल सर्विस की तैयारी छोड़, लड़ी देश की आजादी

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भारतीय स्वतंत्रता में भूमिका निभाने वाले गदर पार्टी के संस्थापक और क्रांतिकारी लाला हर दयाल की 14 अक्टूबर को 135वीं जयंती हैं। उन्होंने विदेशों में रहकर भारतीय आजादी के लिए लड़ाई लड़ी, साथ ही उन्होंने वहां रहने वाले भारतीयों को देश की आजादी के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित किया। उन्होंने अंग्रेजी भाषा से नफरत होने पर सिविल सेवा परीक्षा नहीं दी। उन्होंने ही अमेरिका में रहने वाले प्रवासी भारतीयों को प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारत में सशस्त्र क्रांति के लिए प्रेरित किया।

जीवन परिचय

लाला हर दयाल का जन्म 14 अक्टूबर, 1884 को दिल्ली के एक माथुर कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम गौरी दयाल और माता भोली रानी के सात बच्चों में छठे नंबर के थे। उनके पिता जिला अदालत में रीडर थे। लाला हर दयाल बचपन से आर्य समाज से काफी प्रभावित थे।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा कैम्ब्रिज मिशन स्कूल में हुई। बाद में सेंट स्टीफन कॉलेज, दिल्ली से संस्कृ​त में स्नातक की डिग्री हासिल की। उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय, लाहौर से पहले अंग्रेजी साहित्य में, फिर संस्कृत साहित्य में मास्टर डिग्री प्राप्त की। अध्ययन के प्रति उनकी रुचि को देखते हुए सरकार ने उन्हें 200 पौण्ड की छात्रवृत्ति प्रदान की गई। इससे वह उच्च शिक्षा के लिए लंदन चले गए और वर्ष 1905 में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में दाखिला लिया।

लंदन में अध्ययन के दौरान उन्हें श्यामजी कृष्ण वर्मा के ‘इंडिया हाउस’ में रहने का मौका मिला। यहां पर उनकी मुलाकात श्यामजी कृष्ण वर्मा के अलावा भाई परमानंद, विनायक दामोदर सावरकर और मैडम भीकाजी कामा से हुई।

वर्ष 1905 में ही भारत में बंग-भंग के विरोध में अंग्रेजों के खिलाफ स्वदेशी आंदोलन हुआ। इस आंदोलन को दबाने के लिए अंग्रेजों ने जनता पर अत्याचार किए। जिन्हें सुनकर लाला हर दयाल के मन में अंग्रेजों के प्रति नफरत पैदा हो गई। उन्होंने पढ़ाई अधूरी छोड़ दी और श्यामजी कृष्ण वर्मा के ‘इंडियन सोशियोलोजिस्ट’ नामक मासिक पत्र में स्वतन्त्रता के पक्ष में अपने लेख लिखने लगे।

अंग्रेजी भाषा से नफरत होने पर आई.सी.एस का विचार त्यागा

लाला हर दयाल को लंदन में रहते हुए अंग्रेजी भाषा से ऐसी घृणा हुई कि उन्होंने उससे दूरी बना ली। यहां तक कि उन्होंने अंग्रेजी भाषा में इंडियन सिविल सर्विस की तैयारी का भी विचार त्याग दिया, जबकि उन्हें इस परीक्षा में सफल होने का प्रबल दावेदार माना जा रहा था। उन्होंने भारत सरकार द्वारा दिए जाने वाले वजीफे को भी ठुकरा दिया।

अंग्रेजी से नफरत के बाद उन्होंने अपना जीवन ही बदल लिया। उन्होंने सादा जीवन को अपना लिया। उनका विवाह मेरठ की सुंदर रानी से हुआ। उनके पहली संतान बेटा हुआ जिसकी शैशवावस्था में मृत्यु हो गई। वह अपनी पत्नी को लंदन प्रवास पर वहीं ले गए थे। बाद में पत्नी को मेरठ छोड़ दिया और खुद लाहौर चले गए। यह उनकी अंतिम मुलाकात थी। उसके बाद उनके वर्ष 1908 में एक बेटी हुई जिसका नाम उन्होंने शांति रखा, लेकिन वह उसका चेहरा कभी देख नहीं पाए।

लाहौर में उन्होंने पंजाब नामक अंग्रेजी पत्र का संपादक बनाया गया। जब यहां पर क्रांतिकारियों में उनका प्रभाव बढ़ने लगा, जिससे सरकार उन्हें गिरफ्तार करने की फिराक में थी। इस पर लाला लाजपत राय ने उन्हें विदेश भेज दिया। वह पेरिस पहुंचे। वहां पर श्यामजी कृष्ण वर्मा और भीकाजी कामा से उनकी मिले। लाला हरदयाल ने वहां जाकर ‘वन्दे मातरम्’ और ‘तलवार’ नामक पत्रों का सम्पादन किया। वन्दे मातरम् का प्रथम अंक मदनलाल ढींगरा की स्मृति को समर्पित किया गया।

गदर पार्टी की स्थापना

अमेरिका के सैन फ्रांसिस्कों में गदर पार्टी की स्थापना 25 जून, 1913 को गई थी। इसका उद्देश्य भारत से अंग्रेजी साम्राज्य को जड़ से उखाड़ फेंकना था। गदर पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष सोहन सिंह भकना थे। इसके अतिरिक्त केसर सिंह थथगढ (उपाध्यक्ष), लाला हर दयाल (महामंत्री), लाला ठाकुरदास धुरी (संयुक्त सचिव) और पण्डित कांशीराम मदरोली (कोषाध्यक्ष) थे। इस पार्टी का नाम ‘गदर’ नामक पत्र के आधार पर ही पार्टी का नाम ‘गदर’ पड़ा। ‘गदर’ पत्र ने सारी दुनिया का ध्यान भारत में अंग्रेजी सरकार द्वारा किए जा रहे अत्याचारों की ओर दिलाया।

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सशस्त्र क्रांति

जब अंग्रेज सरकार प्रथम विश्वयुद्ध में फंसी थी तब ही उन्होंने भारत में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारत में सशस्त्र क्रान्ति को प्रोत्साहित करने का नि​श्चय किया। जून 1915 में जर्मनी से दो जहाजों में भरकर बन्दूके बंगाल भेजी गईं, परन्तु मुखबिरों के सूचना पर दोनों जहाज जब्त कर लिए गए। जिससे उनकी यह योजना विफल हो गई। हर दयाल ने भारत का पक्ष प्रचार करने के लिए स्विट्जरलैण्ड, तुर्की आदि देशों की भी यात्रा की। जर्मनी में उन्हें कुछ समय तक नजरबन्द कर लिया गया था। वहां से वे स्वीडन चले गए, जहा उन्होंने अपने जीवन के 15 वर्ष बिताए।

निधन

वर्ष 1939 में वे भारत आने के लिए उत्सुक थे। सर तेज बहादुर सप्रू और सी. एफ. एंड्रूज के प्रयासों से ब्रिटिश सरकार से उन्हें भारत आने की अनुमति मिल गई। परंतु 4 मार्च, 1939 को ही अमेरिका के फिलाडेलिफया में अचानक मृत्यु हो गई। वह स्वस्थ थे और 3 मार्च की रात को आराम से सोये थे लेकिन दूसरे दिन उन्हें मृत पाया गया। माना जाता है कि वह अंग्रेजी सरकार के किसी षड़यंत्र का शिकार हो गए।

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