गोपाल कृष्ण गोखले: आज़ादी के समय अगर यह नेता जिंदा होता तो कभी ना होता देश का बंटवारा

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भारत के स्वतंत्रता संग्राम में मोहनदास करमचंद गांधी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और बाल गंगाधर तिलक जैसे कई सेनानियों का अहम योगदान रहा। इन्हीं में से एक नाम था गोपाल कृष्ण गोखले, जो अंग्रेजों से आज़ादी के लिए आंदोलन से जुड़े देश के बड़े नेताओं में से एक था। जी हां, नरम दल के महान राजनीतिज्ञ गोखले का नाम स्वतंत्रता संग्राम में अग्रिम पंक्ति के नेताओं में रहा। यहां तक कि महात्मा गांधी भी अपने जीवन में राजनीति हुनर सीखने का श्रेय गोखले को ही देते थे। इसलिए ही वह राष्ट्रपिता के राजनीतिक गुरु भी कहलाए। लेकिन गोखले के योगदान के बारे में हमें बहुत कम सुनने और पढ़ने को मिलता है। ऐसे में 19 जनवरी को गोपाल कृष्ण गोखले की पुण्यतिथि के मौके पर जानते हैं उनके बारे में कुछ ख़ास बातें..

पढ़ाई में शुरू से ही अत्यंत मेधावी छात्र थे गोखले

गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 9 मई, 1866 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में एक गरीब परिवार में हुआ था। पढ़ाई में गोखले शुरू से ही अत्यंत मेधावी छात्र थे। स्कूल के दिनों से ही पढ़ाई में उनके प्रदर्शन पर उन्हें सरकार से 20 रुपए की छात्रवृत्ति मिलनी शुरू हो गई थी। गोखले का पढ़ाई को लेकर जुनून देखकर उनके माता-पिता ने यह सुनिश्चित किया कि वो अंग्रेजी शिक्षा हासिल करें ताकि ब्रिटिश राज में उन्हें एक अच्छी नौकरी मिल सकें।

गांधीजी ने देश को आजाद करने के लिए स्वतंत्रता आंदोलन में अहिंसा का रास्ता अपनाया, जिसके प्रेरणास्त्रोत भी गोपाल कृष्ण गोखले को ही माना जाता है। गांधीजी के कहने पर गोखले दक्षिण अफ्रीका भी गए, वहां उन्होंने रंगभेद के ख़िलाफ़ काफी दिनों तक आंदोलन चलाया और रंग-भेद की निंदा की। गोखले वर्ष 1905 में कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बने थे।

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तिलक के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी माने जाते थे

गोपाल कृष्ण गोखले एक नरमपंथी विचारधारा रखने वाले नेता थे। गरम दल के नेता बाल गंगाधर तिलक को उनका सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी माना जाता है। स्वतंत्रता संग्राम के अलावा गोखले ने जीवन भर देश में फैले जातिवाद और छुआछूत के खिलाफ भी काम किया। अपने भाषणों में वो हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात करते थे। माना जाता है कि मोहम्मद अली जिन्ना ने भी गोखले के चातुर्य को देखकर उन्हें अपना राजनीतिक गुरु बनाया।

शिक्षा, महिलाओं के अधिकारों पर किया था काम

गोखले ने अपने संघर्ष के दिनों में शिक्षा, महिलाओं के अधिकारों पर काम किया और सार्वभौमिक और मुक्त प्राथमिक शिक्षा की मांग करने वालों में उनका पहला नाम था। 49 वर्ष की उम्र में 19 फरवरी, 1915 को गोपाल कृष्ण गोखले ने आखिरी सांस ली, उनके निधन पर बाल गंगाधर तिलक ने कहा, ‘भारत का हीरा, महाराष्ट्र का गहना, श्रमिकों का राजकुमार आज अनंत विश्राम ले रहा है। उसे देखो और उसका पालन करने कोशिश करो।’

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