अब्दुल गफ्फार खान: वो स्वतंत्रता सेनानी जिसने आखिरी सांस तक किया पाकिस्तान के बनने का विरोध

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Abdul-Ghaffar-Khan

भारत को आजाद करवाने के लिए सैकड़ों वीरों और सेनानियों ने अपनी जान की बाजी लगाईं, उन महान लोगों में एक नाम खान अब्दुल गफ्फार खान का भी था। आजादी के मतवालों के बीच अंग्रेजों के खिलाफ अब्दुल साहब ने भी आखिर तक जंग लड़ी थी। पश्तून नेता के रूप में पहचान रखने वाले मुखर धार्मिक और राजनीतिक अंदाज रखने वाले अब्दुल गफ्फार खान का जन्म 6 फरवरी, 1890 को उस वक़्त के भारत की पेशावर वैली में उत्मानज़ई गावं के एक पश्तून परिवार में हुआ था। खान साहब आजीवन महात्मा गांधी के अहिंसा के रास्ते पर चले।

खान अब्दुल गफ्फार खां को ‘बच्चा खान’ नाम से भी लोग जानते हैं। वहीं, गांधी के एक दोस्त उन्हें ‘फ्रंटियर गांधी’ भी कहकर बुलाते थे। 20 जनवरी को सीमान्त गांधी यानि अब्दुल साहब की 32वीं पुण्यतिथि है। ऐसे मौके पर जानते हैं अंग्रेजों के नाक में दम करने वाले इस महान क्रांतिकारी के बारे में कुछ ख़ास बातें..

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खुदाई खिदमतगार आंदोलन से तिलमिला उठे अंग्रेज

खान अब्दुल गफ्फार खां शुरू से ही अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोही प्रवृति के रहे। 1929 में अब्दुल साहब ने खुदाई खिदमतगार (सर्वेंट ऑफ गॉड) आंदोलन का बिगुल बजाया। खुदाई खिदमतागर, गांधी जी के सभी अहिंसा आंदोलनों की राह पर था। इस आंदोलन से अंग्रेजी हुकूमत हिल गई और अंग्रेज शासक झल्ला उठे जिसके बाद बाचा खान को जेल में डालकर उन्हें कई यातनाएं दी गई।

गफ्फार खान ने बंटवारे का खुलकर विरोध किया

जब आजादी के समय हिंदुस्तान के बंटवारे की बात उठी तब खान अब्दुल गफ्फार खान इस बंटवारे का मुखर विरोध किया। वो ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की अलग पाकिस्तान की मांग के हमेशा खिलाफ रहे, हालांकि जब बंटवारे पर मुहर लग गई उसके बाद वो कांग्रेस से बोले ‘आपने तो हमें भेड़ियों के सामने फेंक दिया’।

खान साहब ने पाकिस्तान की जेलों में जुल्म सहे

देश के बंटवारे के बाद जब भारत और पाकिस्तान दो अलग मुल्क बने तब अब्दुल गफ्फार खान पाकिस्तान चले गए। 1956 में पाकिस्तान सरकार पश्चिमी पाकिस्तान के सभी प्रोविंसों को मिलाकर अपने पाकिस्तान का विस्तार कर रही थी, तब खान साहब को यह बात नागवार गुजरी और वो इसके विरोध में उतर गए जिसकी वजह से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 1960-70 के दशकों में उन्होंने ज्यादातर समय पाकिस्तान की जेलों में ही बिताया।

अफगानिस्तान के जलालाबाद में दफनाने की थी अंतिम इच्छा

20 जनवरी 1988 को अब्दुल साहब ने पेशावर में आखिरी सांस ली जिससे पहले उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनको अफगानिस्तान के जलालाबाद में दफनाया जाए। अब्दुल गफ्फार खान की इच्छानुसार उनके मृत शरीर को खैबर पास के जरिए जलालाबाद ले जाया गया। हजारों लोगों का हुजूम उनकी अंतिम विदाई में शामिल हुआ।

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