एक अनजान बीमार लड़की को गाने सुनाने अस्पताल पहुंच गए थे लीजेंड मुकेश कुमार!

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भारतीय संगीत जगत में ‘वॉइस ऑफ द मिलेनियम, ट्रेजड़ी किंग’ के नाम से मशहूर रहे गायक मुकेश कुमार की आज पुण्यतिथि है।  मुकेश कुमार का जन्म 22 जुलाई, 1923 को दिल्ली में हुआ था। उनका पूरा नाम मुकेश चंद माथुर था। मुकेश के पिता जोरावर चंद माथुर पेशे से इंजीनियर और मां चंद्राणी माथुर गृ​हणी थीं। परिवार के 10 बच्चों में उनका छठा नंबर था। करीब 36 वर्षों तक भारतीय संगीत की दुनिया को एक से बढ़कर एक हिट देने वाले मुकेश का निधन मात्र 53 वर्ष की उम्र में हो गया था। मिश्री सी मिठी उनकी आवाज आज भी दिलों दिमाग को सुकून देती है। उनके अपने अलग सिंगिंग स्टाइल के सभी कायल थे। आइए मुकेश कुमार पुण्यतिथि के अवसर पर जानते हैं उनके बारे में कुछ दिलचस्प किस्से..

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10वीं कक्षा बाद पीडब्लूडी में शुरू कर दी थी नौकरी

गायक मुकेश कुमार ने दसवीं तक की पढ़ाई करने बाद स्कूल छोड़ दिया था और पीडब्यूडी विभाग में बतौर सहायक सर्वेयर पद पर नौकरी करने लगे। हालांकि, उन्होंने यहां मात्र 7 माह ही काम किया था। कुछ ही साल बाद किस्मत ने उन्हें मायानगरी बॉम्बे (मुंबई) पहुंचा दिया। दरअसल, यह हुआ कि उनकी नौकरी के दौरान अपनी बहन की शादी में गीत गाते समय उनके दूर के रिश्तेदार मशहूर अभिनेता मोतीलाल ने उनकी आवाज सुनकर प्रभावित हो गए। वह मुकेश को वर्ष 1940 में मुंबई ले आए और उन्हें अपने साथ रखकर पंडित जगन्नाथ प्रसाद से संगीत सिखाने का भी प्रबंध किया। गायकी में डेब्यू करने से पहले वह असफ़ल एक्टर भी बन लिए थे।

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मुकेश ने फिल्म ‘निर्दोष’ से किया था एक्टिंग डेब्यू

मुकेश कुमार अपने जमाने के प्रसिद्ध गायक अभिनेता कुंदनलाल सहगल के बड़े फैन थे और उन्हीं की तरह बचपन में गायक-अभिनेता बनने का सपना देखा करते थे। बॉम्बे पहुंचने के बाद वर्ष 1941 में आई एक हिंदी फिल्म ‘निर्दोष’ से मुकेश को अपना एक्टिंग डेब्यू करने का मौका मिला। इस फिल्म की हीरोइन नलिनी जयवंत थीं। इस फिल्म में उन्होंने अभिनेता-गायक के रूप में संगीतकार अशोक घोष के निर्देशन में अपना पहला गीत ‘दिल ही बुझा हुआ हो तो…’ भी गाया। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से फ्लॉप साबित हुई। हालांकि इसके बाद मुकेश ने ‘आदाब अर्ज’, ‘दु:ख-सुख’, ‘माशूका’ और ‘अनुराग’ जैसी कुछ और फिल्मों में भी काम किया, लेकिन सिने दर्शकों ने उनकी एक्टिंग को नकार दिया और वह बतौर एक्टर अपनी पहचान बनाने में कामयाब नहीं हो सके।

रिश्तेदार मोतीलाल ने कराई सिंगिंग कॅरियर की शुरुआत

मुकेश कुमार के रिश्तेदार मोतीलाल उन्हें प्रसिद्ध संगीतकार अनिल बिश्वास के पास लेकर गए और उनसे अनुरोध किया कि वह अपनी फिल्म में मुकेश से कोई गीत गवाएं। वर्ष 1945 में प्रदर्शित फिल्म ‘पहली नज़र’ में अनिल बिश्वास के संगीत निर्देशन में ‘दिल जलता है तो जलने दे…’ गीत के बाद मुकेश कुछ हद तक अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गए। ख़ास बात यह है कि मुकेश ने इस गीत को अपने पसंदीदा एक्टर-सिंगर सहगल की शैली में ही गाया था। सहगल ने जब यह गीत सुना तो उन्होंने कहा था कि बड़ी अज़ीब बात है कि मुझे याद नहीं आता कि मैंने कभी यह गीत गाया है। इसी गीत को सुनने के बाद सहगल साहब ने मुकेश कुमार को अपना उत्तराधिकारी तक घोषित कर दिया था।

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लोगों की मदद करने में खुद भी आगे रहते थे मुकेश

दरअसल, एक बार एक कोई अनजान लड़की अपनी किसी बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती थी। उस लड़की ने अपनी मां से कहा कि यदि मुकेश कुमार उन्हें कोई गाना गाकर सुनाएं तो वह ठीक हो सकती है। मां ने बेटी को जवाब दिया कि मुकेश बहुत बड़े गायक हैं, भला उनके पास तुम्हारे लिए कहां समय है? यदि वे आते भी हैं, तो इसके लिए काफी पैसे लेंगे। मां ने अपनी बेटी की यह बात डॉक्टर को बताई। तब उसके डॉक्टर ने मुकेश को उस लड़की की बीमारी के बारे में बताया। मुकेश कुमार बड़ा दिल दिखाते हुए तुरंत लड़की से मिलने अस्पताल पहुंच गए और उसके लिए गाना गाकर सुनाया और इसके लिए उन्होंने एक पैसा तक नहीं लिया। बीमार लड़की के चेहरे पर खुशी के भाव देखकर महान गायक मुकेश कुमार ने कहा कि यह लड़की जितनी खुश है, उससे ज्यादा खुशी मुझे यहां आकर मिली है। गायकी के अलावा मुकेश अपनी निजी जिंदगी में बहुतों की मदद करने के लिए भी जाने जाते थे।

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‘फिल्‍म फेयर’ अवॉर्ड पाने वाले पहले मेल सिंगर थे मुकेश

50-60 के दशक में मुकेश कुमार की आवाज में सबसे ज्यादा गाने प्रसिद्ध एक्टर दिलीप कुमार पर फिल्माए गए थे। वहीं 50 के दशक में उन्हें शोमैन ‘राज कपूर की आवाज’ तक कहा जाने लगा। राज कपूर और मुकेश में काफी अच्छी बॉन्डिंग हो गई थी। दोनों हमेशा एक-दूसरे की मदद को तैयार रहते थे। साल 1959 में ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म ‘अनाड़ी’ ने राज कपूर को पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड दिलाया था। कुछ ही लोग यह बात जानते हैं कि राज कपूर के जिगरी यार मुकेश कुमार को भी अनाड़ी फिल्म के ‘सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी’ गाने के लिए बेस्ट प्लेबैक सिंगर का फिल्म फेयर अवार्ड मिला था।

मुकेश यह अवॉर्ड पाने वाले पहले पुरुष गायक थे। वर्ष 1974 में फिल्म ‘रजनीगंधा’ के ‘कई बार यूं भी देखा है’ के लिए मुकेश को नेशनल पुरस्कार सम्मानित किया। मुकेश ने लगभग हर तरह के गाने गाए, लेकिन लोगों के बीच उनके दर्द भरे नग़में ज्यादा पसंद किए गए। ‘दर्द का बादशाह’ कहे जाने वाले मुकेश कुमार ने ‘अगर जिंदा हूं मैं इस तरह से’, ‘ये मेरा दीवानापन है’, ‘ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना’, ‘दोस्त दोस्त ना रहा’ जैसे कई गीतों को अपनी मख़मली अवाज़ में पिरोया।

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परिवार के विरोध के बावजूद किया प्रेम विवाह, अमेरिका में हुआ निधन

गायक मुकेश कुमार ने एक गुजराती लड़की सरल से प्रेम विवाह किया था। वह सिर्फ उनसे शादी करना चाहते थे, लेकिन दोनों परिवार में इसका खूब विरोध हुआ। आख़िर दोनों ने परिवारों की परवाह न करते हुए शादी कर ली और यह दिन था मुकेश कुमार का जन्मदिन यानि 22 जुलाई। वर्ष 1946 में मुकेश अपनी प्रेमिका सरल के साथ शादी के अटूट बंधन में बंध गए थे। उल्लेखनीय है कि इन दोनों के एक बेटा और दो बेटियां हैं। बेटे का नाम नितिन मुकेश, जो बॉलीवुड एक्टर नील नितिन के पिता है और बेटियां रीटा व नलिनी हैं। मुकेश कुमार का निधन 27 अगस्त, 1976 को अमेरिका में एक स्टेज शो के दौरान दिल का दौरा पड़ने से हुआ था। उस समय वह स्टेज पर ‘एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल, जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल’ गाना लाइव गा रहे थे। इस तरह एक लीजेंड गायक का निधन भी गायक़ी करते हुए हुआ।

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