राजस्थान के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने थे भैरों सिंह शेखावत, ऐसा रहा राजनीतिक सफर

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भारत के 11वें उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत की 23 अक्टूबर को 96वीं जयंती हैं। वह राजस्थान के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने थे। उन्हें लोग बाबोसा के नाम से भी जानते हैं। वह भारतीय जनता पार्टी के सदस्य थे। भैरों सिंह उपराष्ट्रपति के पद पर 2002 से 2007 तक रहे और राजस्थान के मुख्यमंत्री के रूप में वर्ष 1977 से 1980, 1990 से 1992 और 1993 से 1998 तक तीन बार कार्य भार संभाला। विश्व बैंक के अध्यक्ष रॉबर्ट मैकनामरा ने भैरों सिंह को ‘भारत का रॉकफेलर’ कहा था।

जीवन परिचय

भैरों सिंह शेखावत का जन्म 23 अक्टूबर, 1923 को राजस्थान राज्य के सीकर जिले के ख् के सीकर जिले में खाचरीयावास गांव में हुआ था। उनके पिता देवी सिंह शेखावत और माता बन्ने कंवर थे। उनकी आरंभिक शिक्षा गांव में ही पूरी हुई। हाई स्कूल में पढ़ने के लिए दूसरे गांव में पैदल ही जाते थे। हाई स्कूल की पढ़ाई के बाद वह आगे पढ़ न सके और पिता की मृत्यु के बाद उन पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई। उन्होंने शुरू में खेती की। बाद में वह ब्रिटिश सरकार के काल में सब-इंस्पेक्टर बन गए और इन्हें सीकर का थानेदार बनाया गया।। उनका विवाह सूरज कंवर से हुआ था।

पुलिस की इस नौकरी से उन्हें संतुष्टि नहीं हुई तो उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और राजनीति में अपना भाग्य आजमाने की सोची।

राजनीतिक सफर

पुलिस की नौकरी छोड़ने के बाद भैरों सिंह राजनीति पार्टी जनसंघ से जुड़ गए। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वर्ष 1952 में देश में पहली आम चुनाव में भैरोंसिंह शेखावत ने सीकर जिले के दांतारामगढ विधानसभा क्षेत्र से भाग्य आजमाया और विधायक बने। वर्ष 1952 से 1972 तक वह राजस्थान विधानसभा के सदस्य रहे। वर्ष 1967 के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनसंघ और उसके सहयोगी स्वतंत्र पार्टी बहुमत के नजदीक पहुंची थी लेकिन सरकार नहीं बना सकी।

प्रदेश के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने

शेखावत को वर्ष 1974 से 1977 के बीच मध्यप्रदेश से राज्यसभा सदस्य चुना गया। इस दौरान देश में आपातकाल घोषित होने की वजह से उन्हें 19 महीने जेल में काटने पड़े। इसके बाद नवगठित जनता पार्टी को भारी सफलता मिली। भैरों सिंह 22 जून, 1977 को राजस्थान के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बनने का गौरव हासिल हुआ।

लेकिन वर्ष 1980 में केन्द्र में कांग्रेस की सरकार बनी तो राजस्थान की भैरों सिंह सरकार को भंग कर दिया गया और पुन: चुनाव करवाए। इस बार उन्होंने नवगठित भाजपा के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े और सदन में विपक्ष के नेता बन गए। वर्ष 1990 में जनता दल पार्टी के समर्थन से भैरों सिंह ने दूसरी बार सरकार बनाई और मुख्यमंत्री बने।

वर्ष 1991 में अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद 15 दिसम्बर, 1992 को केंद्र सरकार ने उनकी सरकार को बर्खास्त कर दिया। बाद में उन्होंने वर्ष 1993 में हुए विधानसभा चुनाव में कुछ निर्दलीय विधायकों के समर्थन से 4 दिसम्बर, 1993 को तीसरे बार मुख्यमंत्री बने और वर्ष 1998 तक इस पद पर रहे। वर्ष 1998 में वह प्याज की बढ़ती कीमतों जैसे मुद्दों के कारण चुनाव हार गए।

विधानसभा चुनावों में हार के बाद उन्होंने वर्ष 1999 में लोकसभा के चुनाव जीते। बाद में उन्हें वर्ष 2002 में उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार घोषित किया गया तो उन्होंने सुशील कुमार शिंदे को हराकर देश के 11वें उपराष्ट्रपति चुने गए। जुलाई, 2007 में उन्होंने नेशनल डेमोक्रेटिक अलाइंस के समर्थन से निर्दलीय राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें श्रीमती प्रतिभा पाटिल से हार का सामना करना पड़ा। बाद में उन्होंने 21 जुलाई, 2007 को उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया।

पुरस्कार और सम्मान

उन्हें उनके कार्यों और उपलब्धियों के लिए कई सम्मान और पुरस्कार मिले। आंध्रा विश्वविद्यालय विशाखापट्टनम, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी और मोहनलाल सुखाडि़या विश्वविद्यालय, उदयपुर ने भैरों सिंह को डी लिट की उपाधियां प्रदान की। एशियाटिक सोसायटी ऑफ मुंबई ने उन्हें फैलोशिप से सम्मानित किया तथा येरेवन स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी अर्मेनिया द्वारा उन्हें गोल्ड मेडल के साथ मेडिसिन डिग्री की डॉक्टरेट उपाधि प्रदान की गई।

निधन

भैरों सिंह शेखावत को कैंसर था। उनका 15 मई, 2010 को जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल में निधन हो गया।

 

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