चन्द्रयान-2

चांद का कोई धर्म नहीं, ईद से लेकर करवा चौथ तक चांद है बेहद खास

चांद का कोई धर्म नहीं होता और ना ही चांद किसी एक धर्म तक सीमित होता है। अलग अलग धर्मों में चांद का अपना एक महत्व होता है। हिंदू धर्म में चांद को चंद्र देवता के रूप में मानते है। वहीं मुस्लिम धर्म में ईद का त्योहार चांद पर आधारित होता है। चांद सभी के लिए समानता की भावना रखता है। हमारे देश में कई ऐसे त्योहार है जो चांद पर आधारित है। इन व्रत त्योहारों की पूजा चांद के दर्शन करने और अर्ग देने के बाद ही संपन्न मानी जाती है।

चांद पर आधारित हैं हिंदू धर्म के ये त्योहार

हिंदू धर्म में करवा चौथ को महिलाओं का एक बेहद महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। जिसे महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए रखती है। यह व्रत पूरी तरह से चांद पर आधारित है। इस व्रत में चौथ माता की पूजा के बाद रात को चांद के दर्शन किए जाते है इसके बाद ही ये व्रत संपन्न होता है। वहीं हिंदू धर्म में गणेश चतुर्थी का चांद देखना वर्जित माना जाता है। इसके पीछे एक पौराणिक मान्यता है। जिसके मुताबिक एक बार चांद को गणेश जी ने श्राप दिया था कि जो भी चतुर्थी के दिन तूझे देखेगा उस पर कलंक लग जाएगा। इसके बाद से ही लोग गणेश चतुर्थी के दिन चांद के दर्शन नहीं करते हैं। हिंदू धर्म में चौथ का व्रत, होई अष्टमी, करवा चौथ पूर्णिमा व्रत, कजरी तीज, जैसे कई व्रत त्योहार हैं जो चांद पर आधारित हैं।

चांद और हिजरी कैलेंडर

हिंदू धर्म के अलावा मुस्लिम धर्म में भी चांद का भी काफी महत्व है। आपको जानकर हैरानी हो मगर मुस्लिम धर्म में सभी पर्व, त्यौहार मनाने से पहले चांद का दीदार करते हैं। इसे मानने के पीछे का प्रमुख कारण मुसलमानों का कैलेंडर माना जाता है जिसे हिजरी कैलेंडर कहा जाता है। जिसकी शुरुआत 622 ईस्वी में बताई जाती है। हिजरी कैलेंडर चंद्र गणना पर आधारित है। कहा जाता है कि रसूल ने इसी दौरान मक्का से मदीना के बीच यात्रा करते हुए हिजरत की शुरुआत की थी। चूंकि मुसलमानों के कैलेंडर का आधार चांद ही है इसीलिए मुस्लिम धर्म में चांद का जरूरी महत्व है।

चंद्रग्रहण का है खास महत्व

धरती से चांद भले ही करोड़ो मीलों दूर है मगर इसका प्रभाव इसी बात से लगाया जा सकता है कि हिंदू धर्म में ग्रहण का बड़ा महत्व बताया गया है। ग्रहण का प्रभाव धरती पर भी पड़ता है। चंद्रग्रहण से पहले सूतक काल लग जाता है। आपको बता दें कि चंद्रग्रहण का सूतक 9 घंटे का होता है। जिसमें मंदिरों में भगवान के कपाट नहीं खुलते सूतक काल में घर, मंदिरों में पूजा भी नहीं की जाती, सूतक काल में शुभ कार्य नहीं होते हैं। सूतक काल में ग्रहण का प्रभाव जीव-जंतुओ, खाद्य सामग्री पर पड़ता है।

Sushma Champawat

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